कहाँ आँसू के क़तरे ख़ून-ए-दिल से हैं बहम निकले ये दिल में जम्अ थे मुद्दत से कुछ पैकान-ए-ग़म निकले

“How could these be mere teardrops mingled with the heart's blood? Lodged deep within for ages, the barbed arrowheads of grief have now emerged.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

ये सिर्फ़ दिल के ख़ून में मिले हुए आँसू के क़तरे नहीं हैं, बल्कि ग़म के तीरों की नोकें हैं जो बहुत अरसे से दिल में जमा थीं और अब बाहर निकली हैं।

विस्तार

शायर यहाँ अपने ख़ून मिले आंसुओं को सिर्फ़ मामूली रोना नहीं मानता। उसे लगता है कि ये आँसू नहीं, बल्कि मुद्दतों से दिल में धंसे हुए ग़म के तीरों की पैनी नोकें (पैकान) हैं, जो अब छलक कर बाहर आ रही हैं। यह शेर दिखाता है कि जब बरसों पुराना दर्द हद से गुज़र जाता है, तो दिल के ज़ख़्म पिघलकर आँखों के रास्ते रिसने लगते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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