ग़ज़ल

गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है

گئی یک بہ یک جو ہوا پلٹ نہیں دل کو میرے قرار ہے
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 10 shers· radif: है

यह ग़ज़ल 1857 के बाद बदले राजनीतिक हालात, दिल्ली के उजड़ने और निर्दोष जनता पर ढाए गए अमानवीय ज़ुल्मों का दर्दनाक मरसिया है। कवि देशवासियों की दुर्दशा और क्रूर दमन पर गहरा शोक व बेचैनी प्रकट करता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है करूँ उस सितम को मैं क्या बयाँ मिरा ग़म से सीना फ़िगार है
अचानक हालात का रुख बदल जाने से मेरे दिल को कोई चैन नहीं है, और मैं इस ज़ुल्म को कैसे बयान करूँ जबकि दुख के मारे मेरा सीना छलनी हो चुका है।
2
ये रेआया-ए-हिन्द तबह हुई कहूँ क्या जो इन पे जफ़ा हुई जिसे देखा हाकिम-ए-वक़्त ने कहा ये भी क़ाबिल-ए-दार है
भारत की जनता बर्बाद हो गई है, मैं उन पर हुए ज़ुल्मों का क्या बयान करूँ। उस दौर के शासक ने जिस किसी को भी देखा, यही कहा कि यह भी फाँसी पर लटकाए जाने के लायक़ है।
3
ये किसी ने ज़ुल्म भी है सुना कि दी फाँसी लोगों को बे-गुनाह वही कलमा-गोयों की सम्त से अभी दिल में उन के बुख़ार है
क्या किसी ने ऐसा ज़ुल्म भी सुना है कि बेगुनाह लोगों को फाँसी दे दी जाए? ऐसा लगता है कि उनके दिलों में कलमा पढ़ने वालों के प्रति अब भी गुस्सा और द्वेष भरा हुआ है।
4
न था शहर-ए-देहली ये था चमन कहो किस तरह का था याँ अमन जो ख़िताब था वो मिटा दिया फ़क़त अब तो उजड़ा दयार है
दिल्ली महज़ एक शहर नहीं बल्कि एक हरा-भरा चमन थी, जहाँ कभी बेमिसाल अमन और चैन हुआ करता था। अब उसकी वह पहचान और रुतबा मिटा दिया गया है और वह सिर्फ़ एक उजड़ा हुआ इलाक़ा बनकर रह गई है।
5
यही तंग हाल जो सब का है ये करिश्मा क़ुदरत-ए-रब का है जो बहार थी सो ख़िज़ाँ हुई जो ख़िज़ाँ थी अब वो बहार है
आज सब लोगों का जो यह बुरा और तंग हाल है, यह ईश्वर की कुदरत का करिश्मा है; जो पहले बहार थी वह अब पतझड़ बन चुकी है और जो पतझड़ था वह अब बहार बन गया है।
6
शब-ओ-रोज़ फूल में जो तुले कहो ख़ार-ए-ग़म को वो क्या सहे मिले तौक़ क़ैद में जब उन्हें कहा गुल के बदले ये हार है
जो दिन-रात फूलों में तुलता रहा हो, वह भला दुख के कांटों को कैसे सह सकता था; मगर जब क़ैद में उसे लोहे का तौक़ पहनाया गया, तो उसने कहा कि यह फूलों के बदले एक हार है।
7
सभी जादा मातम-ए-सख़्त है कहो कैसी गर्दिश-ए-बख़्त है न वो ताज है न वो तख़्त है न वह शाह है न दयार है
हर रास्ता गहरे मातम में डूबा हुआ है, कहो यह किस्मत का कैसा बुरा फेर है। अब न वह ताज रहा, न वह तख्त, न वह बादशाह बचा और न ही वह देश या शहर।
8
जो सुलूक करते थे और से वही अब हैं कितने ज़लील से वो हैं तंग चर्ख़ के जौर से रहा तन पे उन के न तार है
जो लोग पहले दूसरों के साथ बुरा व्यवहार करते थे, आज वे खुद अत्यंत अपमानित हो चुके हैं; वे किस्मत के सितम से इतने बेहाल हैं कि उनके शरीर पर कपड़े का एक धागा तक नहीं बचा है।
9
न वबाल तन पे है सर मिरा नहीं जान जाने का डर ज़रा कटे ग़म ही, निकले जो दम मिरा मुझे अपनी ज़िंदगी बार है
मेरे जिस्म पर मेरा सिर कोई बोझ नहीं है और न ही मुझे अपनी जान जाने का ज़रा सा भी डर है। अगर मेरा दम निकल जाए तो मेरा ग़म ही ख़त्म होगा, क्योंकि मुझे अपनी ज़िंदगी बोझ मालूम होती है।
10
क्या है ग़म 'ज़फ़र' तुझे हश्र का जो ख़ुदा ने चाहा तो बरमला हमें है वसीला रसूल का वो हमारा हामी-ए-कार है
ऐ ज़फ़र, तुम्हें क़यामत के दिन का क्या डर है? अगर ख़ुदा ने चाहा तो यह साफ़ ज़ाहिर है कि हमारे पास पैगंबर का वसीला (सहारा) है और वही हमारे मददगार हैं।
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