“Delhi was no mere city, but a flourishing garden; speak of the peace that once reigned here! / The title it proudly bore has been erased; now it remains nothing but a desolate realm.”
दिल्ली महज़ एक शहर नहीं बल्कि एक हरा-भरा चमन थी, जहाँ कभी बेमिसाल अमन और चैन हुआ करता था। अब उसकी वह पहचान और रुतबा मिटा दिया गया है और वह सिर्फ़ एक उजड़ा हुआ इलाक़ा बनकर रह गई है।
शायर यहाँ दिल्ली को सिर्फ़ एक शहर नहीं, बल्कि अमन और तहज़ीब से महकता हुआ एक गुलशन मानते हैं। अफ़सोस इस बात का है कि वक़्त के बेरहम थपेड़ों ने इसकी पुरानी पहचान और शान को पूरी तरह मिटा दिया। यह शेर महज़ इमारतों की बर्बादी का नहीं, बल्कि एक सुनहरे दौर और उसके सुकून के उजड़ जाने का बेहद दर्दभरा मातम है।
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