“Ruined are the people of Hind, how can I recount the cruelties they bore; whomever the ruler of the age beheld, he decreed: 'This one too deserves the gallows!'”
भारत की जनता बर्बाद हो गई है, मैं उन पर हुए ज़ुल्मों का क्या बयान करूँ। उस दौर के शासक ने जिस किसी को भी देखा, यही कहा कि यह भी फाँसी पर लटकाए जाने के लायक़ है।
यह शेर 1857 के दौर की उस दर्दनाक और ख़ौफ़नाक तस्वीर को खींचता है, जब हिंदुस्तान की अवाम पर औपनिवेशिक हुकूमत के बेइंतहा ज़ुल्म ढाए जा रहे थे। हाकिम का डर और वहशत इस कदर हावी थी कि उसकी नज़र जिस बेगुनाह पर भी पड़ती, उसे बिना किसी जुर्म के सीधे फांसी के फंदे का हक़दार मान लिया जाता था। यहाँ 'दार' यानी फांसी का तख्ता उस अंधेरगर्दी और बेबसी का प्रतीक है, जहाँ सिर्फ़ ज़िंदा होना ही एक जुर्म बन गया था।
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