ग़ज़ल
तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है
تری زلفوں میں دل الجھا ہوا ہے
यह ग़ज़ल इश्क़ के दिलकश मगर दर्दनाक असर को बयां करती है, जहाँ आशिक़ का दिल महबूब की ज़ुल्फ़ों के जाल में बेबस होकर उलझ गया है। इसमें महबूब के सितम और प्रेम की पीड़ा को गहरी विवशता और भावुकता के साथ प्रस्तुत किया गया है।
Source: rekhta · HI
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1
तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है
बला के पेच में आया हुआ है
मेरा दिल तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में उलझ गया है और एक भयानक मुसीबत के चक्कर में फँस चुका है।
2
न क्यूँकर बू-ए-ख़ूँ नामे से आए
उसी जल्लाद का लिक्खा हुआ है
इस पत्र से ख़ून की बू क्यों न आए, आख़िरकार यह उसी जल्लाद का लिखा हुआ है।
3
चले दुनिया से जिस की याद में हम
ग़ज़ब है वो हमें भूला हुआ है
हम जिसकी याद में इस दुनिया से चले गए, सितम यह है कि वही हमें पूरी तरह भुला चुका है।
4
कहूँ क्या हाल अगली इशरतों का
वो था इक ख़्वाब जो भूला हुआ है
मैं बीते समय की खुशियों और ऐश-ओ-इशरत का क्या हाल बताऊँ? वह तो महज़ एक ख़्वाब था जिसे अब भुला दिया गया है।
5
जफ़ा हो या वफ़ा हम सब में ख़ुश हैं
करें क्या अब तो दिल अटका हुआ है
चाहे बेवफ़ाई मिले या वफ़ा, हम हर हाल में खुश हैं। अब हम क्या करें, क्योंकि हमारा दिल आपसे लग चुका है।
6
हुई है इश्क़ ही से हुस्न की क़द्र
हमीं से आप का शोहरा हुआ है
सुंदरता का महत्व केवल प्रेम के कारण ही है, और हमारे ही कारण आपका नाम और चर्चा चारों ओर फैली है।
7
बुतों पर रहती है माइल हमेशा
तबीअत को ख़ुदाया क्या हुआ है
मेरा दिल हमेशा बुतों (सुंदर महबूबों) की ओर ही आकर्षित रहता है; हे ईश्वर, मेरी तबीयत को आख़िर क्या हो गया है?
8
परेशाँ रहते हो दिन रात 'अकबर'
ये किस की ज़ुल्फ़ का सौदा हुआ है
ऐ 'अकबर', तुम दिन-रात परेशान और बेचैन रहते हो; यह किसकी ज़ुल्फ़ों की दीवानगी या जुनून तुम पर सवार हो गया है?
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