“Restless you remain both day and night, O Akbar; whose dark tresses have driven you to such madness?”
ऐ 'अकबर', तुम दिन-रात परेशान और बेचैन रहते हो; यह किसकी ज़ुल्फ़ों की दीवानगी या जुनून तुम पर सवार हो गया है?
इस शेर में 'परेशाँ' लफ़्ज़ का बहुत खूबसूरत खेल है, जिसका मतलब उलझा हुआ या बिखरा हुआ भी होता है—ठीक महबूब की ज़ुल्फ़ों की तरह। शायर खुद से ही किसी फिक्रमंद दोस्त की तरह पूछ रहा है कि आख़िर यह कैसी दीवानगी और बेचैनी है जिसने तुम्हें दिन-रात घेर रखा है। उर्दू शायरी में महबूब की काली ज़ुल्फ़ें एक ऐसा तिलिस्म हैं, जिसमें दिल एक बार उलझ जाए तो होश-ओ-हवास खोकर बस उसी के ख़याल में खोया रहता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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