ग़ज़ल
ख़ुदा अलीगढ़ के मदरसे को तमाम अमराज़ से शिफ़ा दे
خدا علی گڑھ کی مدرسے کو تمام امراض سے شفا دے
यह रचना अलीगढ़ के संस्थान की बेहतरी और सलामती के लिए की गई एक दुआ और रोचक चित्रण है। इसमें वहाँ पढ़ने वाले कुलीन, सलीक़ेदार और होनहार नौजवानों की खूबियों को सराहते हुए संस्थान को तमाम बुराइयों और कमियों से महफ़ूज़ रखने की कामना की गई है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
ख़ुदा अलीगढ़ के मदरसे को तमाम अमराज़ से शिफ़ा दे
भरे हुए हैं रईस-ज़ादे अमीर-ज़ादे शरीफ़-ज़ादे
ईश्वर अलीगढ़ के मदरसे को तमाम बीमारियों से शिफ़ा दे, क्योंकि यह रईसों, अमीरों और शरीफ़ों के बेटों से भरा हुआ है।
2
लतीफ़ ओ ख़ुश-वज़्अ चुस्त-ओ-चालाक ओ साफ़-ओ-पाकीज़ा शाद-ओ-ख़ुर्रम
तबीअतों में है उन की जौदत दिलों में उन के हैं नेक इरादे
वे शालीन, सुरुचिपूर्ण, चुस्त, चतुर, पवित्र और प्रसन्नचित्त हैं; उनके स्वभाव में बुद्धिमत्ता और तीव्रता है तथा उनके दिलों में नेक इरादे हैं।
3
कमाल मेहनत से पढ़ रहे हैं कमाल ग़ैरत से बढ़ रहे हैं
सवार मशरिक़ की राह में हैं तो मग़रिबी राह में पियादे
लोग अत्यधिक मेहनत से पढ़ रहे हैं और बड़े आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ रहे हैं; वे पूरब की राह पर तो घुड़सवारों की तरह आगे हैं, मगर पश्चिम के रास्ते पर केवल पैदल सिपाही बने हुए हैं।
4
हर इक है उन में का बे-शक ऐसा कि आप उसे जानते हैं जैसा
दिखाए महफ़िल में क़द्द-ए-रअना जो आप आएँ तो सर झुका दे
उनमें से हर एक व्यक्ति बेशक वैसा ही है जैसा आप उसे जानते हैं; वह महफ़िल में तो अपना शानदार क़द दिखाता है, लेकिन आपके आते ही अपना सिर झुका देता है।
5
फ़क़ीर माँगें तो साफ़ कह दें कि तू है मज़बूत जा कमा खा
क़ुबूल फ़रमाएँ आप दावत तो अपना सरमाया कुल खिला दे
यदि कोई फ़क़ीर कुछ माँगे तो लोग साफ़ कह देते हैं कि तुम हट्टे-कट्टे हो जाकर कमाकर खाओ, लेकिन अगर कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति दावत स्वीकार कर ले, तो उसकी ख़ातिर अपनी सारी पूँजी ख़र्च कर देते हैं।
6
बुतों से उन को नहीं लगावट मिसों की लेते नहीं वो आहट
तमाम क़ुव्वत है सर्फ़-ए-ख़्वाँदन नज़र के भोले हैं दिल की सादे
उन्हें न तो हसीनों (बुतों) से कोई लगाव है और न ही वे अंग्रेज़ युवतियों (मिसों) की आहट पर ध्यान देते हैं; उनकी सारी ऊर्जा सिर्फ़ पढ़ाई-लिखाई में खर्च होती है, वे नज़र के भोले और दिल के सादे हैं।
7
नज़र भी आए जो ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ तो समझें ये कोई पालिसी है
इलेक्ट्रिक लाईट उस को समझें जो बर्क़-वश कोई कोई दे
अगर कभी उलझी हुई ज़ुल्फ़ें नज़र भी आ जाएँ तो समझें कि यह कोई सोची-समझी नीति या चाल है, और बिजली की रोशनी सिर्फ़ उसे समझें जो कभी-कभार कौंधती बिजली की तरह दिखाई दे।
8
निकलते हैं कर के ग़ोल-बंदी ब-नाम-ए-तहज़ीब ओ दर्द-मंदी
ये कह के लेते हैं सब से चंदे हमें जो तुम दो तुम्हें ख़ुदा दे
लोग तहज़ीब और हमदर्दी के नाम पर गिरोह बनाकर निकलते हैं और यह कहकर सबसे चंदा मांगते हैं कि जो तुम हमें दोगे, खुदा तुम्हें उसका बदला देगा।
9
उन्हें इसी बात पर यक़ीन है कि बस यही असल कार-ए-दीं है
इसी सी होगा फ़रोग़-ए-क़ौमी इसी से चमकेंगे बाप दादे
उन्हें इस बात का पक्का विश्वास है कि बस यही धर्म का असली काम है, और इसी से क़ौम की उन्नति होगी तथा पूर्वजों का नाम रौशन होगा।
10
मकान-ए-कॉलेज के सब मकीं हैं अभी उन्हें तजरबे नहीं हैं
ख़बर नहीं है कि आगे चल कर है कैसी मंज़िल हैं कैसी जादे
कॉलेज में रहने वाले इन नौजवानों को अभी दुनिया का कोई तजुर्बा नहीं है, और वे नहीं जानते कि आगे चलकर उन्हें कैसे रास्ते और कैसी मंज़िलें मिलेंगी।
11
दिलों में उन के है नूर-ए-ईमाँ क़वी नहीं है मगर निगहबाँ
हवा-ए-मंतिक़ अदा-ए-तिफ़ली ये शम्अ ऐसा न हो बुझा दे
उनके दिलों में ईमान की रोशनी मौजूद है लेकिन उसका रखवाला मज़बूत नहीं है। ऐसा न हो कि तर्क की हवा और बचकानी आदतें इस शमा को बुझा दें।
12
फ़रेब दे कर निकाले मतलब सिखाए तहक़ीर-ए-दीन-ओ-मज़हब
मिटा दे आख़िर को वज़-ए-मिल्लत नुमूद-ए-ज़ाती को गर बढ़ा दे
यह धोखे से अपना मतलब निकालता है और धर्म व मज़हब का अपमान करना सिखाता है, और यदि अपनी निजी नुमाइश व अहंकार को बढ़ाना हो तो अंत में क़ौम की पहचान और मर्यादा को भी मिटा देता है।
13
यही बस 'अकबर' की इल्तिजा है जनाब-ए-बारी में ये दुआ है
उलूम-ओ-हिकमत का दर्स उन को प्रोफ़ेसर दें समझ ख़ुदा दे
अकबर की ईश्वर से बस यही विनती और प्रार्थना है कि प्रोफेसर भले ही लोगों को ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा दें, परंतु उन्हें समझने की वास्तविक बुद्धि ईश्वर प्रदान करे।
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