मकान-ए-कॉलेज के सब मकीं हैं अभी उन्हें तजरबे नहीं हैं ख़बर नहीं है कि आगे चल कर है कैसी मंज़िल हैं कैसी जादे

“Sheltered dwellers of the college halls, as yet untouched by worldly trial; they know not what rugged paths lie ahead, nor what destinations wait beyond the mile.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

कॉलेज में रहने वाले इन नौजवानों को अभी दुनिया का कोई तजुर्बा नहीं है, और वे नहीं जानते कि आगे चलकर उन्हें कैसे रास्ते और कैसी मंज़िलें मिलेंगी।

विस्तार

यह शेर कॉलेज के उस मासूम और महफ़ूज़ दौर की तस्वीर खींचता है, जहाँ ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाइयों से अभी सामना नहीं हुआ होता। कॉलेज की चहारदीवारी में रहने वाले नौजवान अपने ख्वाबों में मगन हैं और दुनियादारी की धूप-छांव से पूरी तरह बेखबर हैं। शायर एक हमदर्द दोस्त की तरह याद दिलाता है कि इस दायरे से बाहर कदम रखते ही ज़िन्दगी के रास्ते कितने पेचीदा और आज़माइशें कितनी कड़ी होने वाली हैं।

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