निकलते हैं कर के ग़ोल-बंदी ब-नाम-ए-तहज़ीब ओ दर्द-मंदी ये कह के लेते हैं सब से चंदे हमें जो तुम दो तुम्हें ख़ुदा दे

“Forming factions they venture out in the name of culture and compassion, extracting donations from all with the cry: 'Whatever you give us, may God grant you in return!'”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

लोग तहज़ीब और हमदर्दी के नाम पर गिरोह बनाकर निकलते हैं और यह कहकर सबसे चंदा मांगते हैं कि जो तुम हमें दोगे, खुदा तुम्हें उसका बदला देगा।

विस्तार

यह शेर समाज के उन पाखंडियों पर तीखा और चुटीला तंज़ है, जो समाज-सेवा और संस्कृति की आड़ में अपनी जेबें भरते हैं। शायर एक मजेदार मगर कड़वी तस्वीर खींचते हैं कि कैसे लोग गिरोह बनाकर निकलते हैं और इंसानियत के नाम पर चंदा वसूलने लगते हैं। फकीरों की तरह 'हमें जो तुम दो तुम्हें ख़ुदा दे' की सदा लगाकर वे दरअसल यह दिखा देते हैं कि बड़े-बड़े आदर्शों के पीछे उनका असली मकसद सिर्फ खुद का फायदा निकालना है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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