ग़ज़ल
बे-तकल्लुफ़ बोसा-ए-ज़ुल्फ़-ए-चलीपा लीजिए
بے تکلف بوسۂ زلف چلےپا لیجئے
यह ग़ज़ल प्रेम में पूर्ण समर्पण और उत्कट आशिकी के भाव को व्यक्त करती है। इसमें प्रेमी अपने महबूब की हर मांग पर बिना किसी संकोच के अपना दिल और जान न्योछावर करने को तैयार दिखाई देता है।
Source: rekhta · HI
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1
बे-तकल्लुफ़ बोसा-ए-ज़ुल्फ़-ए-चलीपा लीजिए
नक़्द-ए-दिल मौजूद है फिर क्यूँ न सौदा लीजिए
बिना किसी हिचक के उन उलझी हुई ज़ुल्फ़ों का बोसा ले लीजिए; जब दिल की नक़दी मौजूद है, तो फिर यह सौदा क्यों न कर लिया जाए।
2
दिल तो पहले ले चुके अब जान के ख़्वाहाँ हैं आप
इस में भी मुझ को नहीं इंकार अच्छा लीजिए
आप मेरा दिल तो पहले ही ले चुके हैं और अब मेरी जान चाहते हैं; मुझे इस पर भी कोई इनकार नहीं है, ठीक है इसे भी ले लीजिए।
3
पाँव पकड़ कर कहती है ज़ंजीर-ए-ज़िंदाँ में रहो
वहशत-ए-दिल का है ईमा राह-ए-सहरा लीजिए
क़ैदख़ाने की ज़ंजीर पाँव पकड़ कर कहती है कि क़ैद में ही रहो, जबकि दिल की दीवानगी का इशारा है कि सहरा का रास्ता पकड़ लो।
4
ग़ैर को तो कर के ज़िद करते हैं खाने में शरीक
मुझ से कहते हैं अगर कुछ भूक हो खा लीजिए
वे ग़ैर (रक़ीब) को तो ज़िद करके अपने साथ खाने में शामिल करते हैं, लेकिन मुझसे सिर्फ़ बेरुखी से कहते हैं कि अगर भूख हो तो खा लीजिए।
5
ख़ुश-नुमा चीज़ें हैं बाज़ार-ए-जहाँ में बे-शुमार
एक नक़द-ए-दिल से या-रब मोल क्या क्या लीजिए
दुनिया के इस बाज़ार में बेशुमार ख़ूबसूरत चीज़ें मौजूद हैं, हे भगवान! दिल की महज़ एक पूँजी से आख़िर क्या-क्या ख़रीदा जाए?
6
कुश्ता आख़िर आतिश-ए-फ़ुर्क़त से होना है मुझे
और चंदे सूरत-ए-सीमाब तड़पा लीजिए
आखिरकार मुझे जुदाई की आग में ही मरना है, इसलिए कुछ देर और मुझे पारे की तरह बेकरार करके तड़पा लीजिए।
7
फ़स्ल-ए-गुल के आते ही 'अकबर' हुए बेहोश आप
खोलिए आँखों को साहब जाम-ए-सहबा लीजिए
फूलों के मौसम यानी वसंत के आते ही अकबर आप बेहोश हो गए हैं; जनाब, अपनी आँखें खोलिए और शराब का प्याला लीजिए।
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