ग़ैर को तो कर के ज़िद करते हैं खाने में शरीक मुझ से कहते हैं अगर कुछ भूक हो खा लीजिए

“The rival they press with insistence to join them in their feast; / To me they casually say, 'Do eat, if hungry in the least.'”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

वे ग़ैर (रक़ीब) को तो ज़िद करके अपने साथ खाने में शामिल करते हैं, लेकिन मुझसे सिर्फ़ बेरुखी से कहते हैं कि अगर भूख हो तो खा लीजिए।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ अपने महबूब के दोहरे रवैये पर हल्की तंज़ और गहरे दर्द के साथ शिकायत कर रहा है। रक़ीब (ग़ैर) को तो वो मनुहार करके और ज़िद के साथ दस्तरख़्वान पर बिठाते हैं, मगर सच्चे आशिक़ से महज़ बेदिली और रस्म अदायगी के तौर पर कह दिया जाता है कि 'भूख हो तो खा लीजिए'। यह तफ़रीक़ दिखाती है कि मोहब्बत में बेरुखी से भरा हुआ यह झूठा तकल्लुफ़ किसी साफ़ इनकार से भी ज़्यादा दिल को चुभता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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