ग़ज़ल
बहुत रहा है कभी लुत्फ़-ए-यार हम पर भी
بہت رہا ہے کبھی لطف یار ہم پر بھی
यह ग़ज़ल बीते हुए सुनहरे दौर, जवानी और महबूब की इनायतों की एक उदास मगर पुरअसर याद है। शायर याद करता है कि कभी ज़माना और महबूब दोनों उस पर मेहरबान थे, लेकिन अब वह बहार बीत चुकी है और सिर्फ़ पुरानी यादें बाक़ी हैं।
Source: rekhta · HI
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1
बहुत रहा है कभी लुत्फ़-ए-यार हम पर भी
गुज़र चुकी है ये फ़स्ल-ए-बहार हम पर भी
एक समय हम पर भी महबूब की बहुत मेहरबानी रही है; खुशियों और बहार का यह सुहावना मौसम हमारी ज़िंदगी से भी गुज़र चुका है।
2
उरूस-ए-दहर को आया था प्यार हम पर भी
ये बेसवा थी किसी शब निसार हम पर भी
दुनिया रूपी दुल्हन को एक समय हम पर भी प्यार आया था, और यह वेश्या किसी रात हम पर भी न्योछावर हुई थी।
3
बिठा चुका है ज़माना हमें भी मसनद पर
हुआ किए हैं जवाहिर निसार हम पर भी
ज़माना हमें भी कभी सम्मान की मसनद (गद्दी) पर बिठा चुका है, और कभी हम पर भी हीरे-जवाहरात न्योछावर किए गए हैं।
4
अदू को भी जो बनाया है तुम ने महरम-ए-राज़
तो फ़ख़्र क्या जो हुआ ए'तिबार हम पर भी
जब आपने दुश्मन को भी अपने राज़ का हमराज़ बना लिया है, तो फिर मुझ पर भरोसा करने में मेरे लिए गर्व की क्या बात रह गई।
5
ख़ता किसी की हो लेकिन खुली जो उन की ज़बाँ
तो हो ही जाते हैं दो एक वार हम पर भी
गलती भले ही किसी और की हो, लेकिन जब उनकी ज़ुबान चलती है तो एक-दो वार मुझ पर भी ज़रूर हो जाते हैं।
6
हम ऐसे रिंद मगर ये ज़माना है वो ग़ज़ब
कि डाल ही दिया दुनिया का बार हम पर भी
हम ऐसे लापरवाह और मस्तमौला इंसान थे, मगर इस ज़माने का ऐसा सितम रहा कि उसने आखिरकार दुनियादारी का बोझ हम पर भी लाद ही दिया।
7
हमें भी आतिश-ए-उल्फ़त जला चुकी 'अकबर'
हराम हो गई दोज़ख़ की नार हम पर भी
ऐ अकबर, हमें भी प्रेम की आग पहले ही जला चुकी है, इसलिए अब हम पर दोज़ख़ (नरक) की आग भी हराम हो गई है।
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