ख़ता किसी की हो लेकिन खुली जो उन की ज़बाँ तो हो ही जाते हैं दो एक वार हम पर भी

“Whoever may be to blame, once their tongue begins to strike, a blow or two inevitably falls upon me too.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

गलती भले ही किसी और की हो, लेकिन जब उनकी ज़ुबान चलती है तो एक-दो वार मुझ पर भी ज़रूर हो जाते हैं।

विस्तार

इस शेर में एक बड़ा ही प्यारा और बेबसी भरा अंदाज़ झलकता है। आशिक़ कहता है कि ग़लती चाहे किसी और की हो, मगर जब महबूब की ज़ुबान तलवार की तरह चलने लगती है, तो उसकी चोट के दो-चार वार अनजाने में हम पर भी आ गिरते हैं। यह उस ख़ास रिश्ते की हक़ीक़त है जहाँ महबूब का ग़ुस्सा किसी और पर होता है, मगर उसका हक़ समझकर निशाना सबसे क़रीबी इंसान को ही बनाया जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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