हम ऐसे रिंद मगर ये ज़माना है वो ग़ज़ब कि डाल ही दिया दुनिया का बार हम पर भी

“Such carefree libertines were we, yet cruel is the times' severe decree; / It cast the burden of the world at last upon us too.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

हम ऐसे लापरवाह और मस्तमौला इंसान थे, मगर इस ज़माने का ऐसा सितम रहा कि उसने आखिरकार दुनियादारी का बोझ हम पर भी लाद ही दिया।

विस्तार

'रिंद' उस मस्तमौला इंसान को कहते हैं जो दुनियादारी और समाज की फ़िक्रों से कोसों दूर रहता है। शायर यहाँ हल्की सी लाचारी और तंज़ के साथ कहता है कि ज़माना इतना बेरहम निकला कि उसने हम जैसे बेपरवाह फ़क़ीर-मिज़ाज लोगों के कंधों पर भी दुनिया की जिम्मेदारियों और दुखों का भारी बोझ लाद ही दिया। यह शेर उस दर्द को छूता है जब ज़िंदगी की मजबूरियाँ आज़ाद रूहों को भी सांसारिक उलझनों में बांध लेती हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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