ग़ज़ल

बिठाई जाएँगी पर्दे में बीबियाँ कब तक

بٹھائی جائیں گی پردے میں بیبیاں کب تک
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 7 shers· radif: कब तक

यह ग़ज़ल समाज में महिलाओं को पर्दे में कैद रखने की रूढ़िवादी परंपरा और पुरुषों की निष्क्रियता पर तीखा व्यंग्य करती है। शायर सवाल उठाता है कि वास्तविक शक्ति और चेतना के अभाव में कमज़ोर पाबंदियों के सहारे पुरानी व्यवस्था को कब तक कायम रखा जा सकता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
बिठाई जाएँगी पर्दे में बीबियाँ कब तक बने रहोगे तुम इस मुल्क में मियाँ कब तक
आख़िर कब तक औरतों को पर्दे में बंद रखा जाएगा, और तुम मर्द कब तक इस मुल्क के मालिक और हुक्मरान बने रहोगे?
2
हरम-सरा की हिफ़ाज़त को तेग़ ही न रही तो काम देंगी ये चिलमन की तीलियाँ कब तक
जब अंतःपुर की रक्षा के लिए तलवार ही नहीं बची, तो पर्दे की यह कमज़ोर तीलियाँ कब तक काम आ सकेंगी?
3
मियाँ से बीबी हैं पर्दा है उन को फ़र्ज़ मगर मियाँ का इल्म ही उट्ठा तो फिर मियाँ कब तक
पत्नी का अस्तित्व पति से ही है और उस पर पर्दा करना फ़र्ज़ है, लेकिन यदि पति का ज्ञान या पहचान ही मिट जाए, तो फिर पति का दर्जा कब तक बना रह सकता है।
4
तबीअतों का नुमू है हवा-ए-मग़रिब में ये ग़ैरतें ये हरारत ये गर्मियाँ कब तक
लोगों के मिज़ाज का विकास पश्चिमी हवा में हो रहा है; ऐसे में यह पुरानी ग़ैरत, जज़्बा और जोश भला कब तक क़ायम रह सकता है?
5
अवाम बाँध लें दोहर तो थर्ड वानटर में सेकंड-फ़र्स्ट की हों बंद खिड़कियाँ कब तक
यदि आम जनता जाड़ों में ट्रेन के तीसरे दर्जे में दोहर ओढ़ ले, तो पहले और दूसरे दर्जे की खिड़कियाँ कब तक बंद रह सकती हैं?
6
जो मुँह दिखाई की रस्मों पे है मुसिर इबलीस छुपेंगी हज़रत-ए-हवा की बेटियाँ कब तक
अगर शैतान मुँह दिखाई की रस्म पर इस कदर अड़ा हुआ है, तो हज़रत-ए-हव्वा की बेटियाँ आख़िर कब तक छुपी रह पाएँगी।
7
जनाब हज़रत-ए-'अकबर' हैं हामी-ए-पर्दा मगर वो कब तक और उन की रुबाइयाँ कब तक
आदरणीय अकबर इलाहाबादी पर्दे के समर्थक तो हैं, मगर आख़िर वो कब तक रहेंगे और उनकी रुबाइयाँ कब तक टिक पाएँगी?
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