ग़ज़ल
क्या जानिए सय्यद थे हक़ आगाह कहाँ तक
کیا جانیے سید تھے حق آگاہ کہاں تک
इस व्यंग्यात्मक ग़ज़ल में अकबर इलाहाबादी समकालीन सुधारवादी विचारों और वैचारिक हठधर्मिता पर तीखा तंज़ करते हैं। कवि ने अपनी चिरपरिचित हास्य-व्यंग्य शैली में तर्क, विवेक और निजी दृष्टिकोण को अंधी पैरवी के मुकाबले तरजीह दी है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
क्या जानिए सय्यद थे हक़ आगाह कहाँ तक
समझे न कि सीधी है मिरी राह कहाँ तक
कौन जाने कि सय्यद सच्चाई से किस हद तक वाकिफ़ थे, क्योंकि वह यह समझ ही न सके कि मेरा रास्ता कितना सीधा है।
2
मंतिक़ भी तो इक चीज़ है ऐ क़िबला ओ काबा
दे सकती है काम आप की वल्लाह कहाँ तक
ऐ आदरणीय बुज़ुर्ग, तर्क और दलील भी कोई चीज़ होती है; आपकी यह 'वल्लाह' (क़सम खाना) भला कहाँ तक काम आ सकती है?
3
अफ़्लाक तो इस अहद में साबित हुए मादूम
अब क्या कहूँ जाती है मिरी आह कहाँ तक
इस ज़माने में तो आसमानों का अस्तित्व ही ख़त्म या शून्य साबित हो चुका है, अब मैं क्या कहूँ कि मेरी आह कहाँ तक जाती है।
4
कुछ सनअत ओ हिरफ़त पे भी लाज़िम है तवज्जोह
आख़िर ये गवर्नमेंट से तनख़्वाह कहाँ तक
उद्योग और दस्तकारी पर भी ध्यान देना ज़रूरी है, आख़िर सरकार से मिलने वाले वेतन पर कब तक निर्भर रहा जा सकता है?
5
मरना भी ज़रूरी है ख़ुदा भी है कोई चीज़
ऐ हिर्स के बंदो हवस-ए-जाह कहाँ तक
मौत भी तय है और ईश्वर भी एक हक़ीक़त है; ऐ लालच के बंदो, पद और रुतबे की यह हवस आख़िर कब तक चलेगी?
6
तहसीन के लायक़ तिरा हर शेर है 'अकबर'
अहबाब करें बज़्म में अब वाह कहाँ तक
हे अकबर, तुम्हारा हर शेर तारीफ़ के क़ाबिल है, लेकिन महफ़िल में दोस्त आख़िर कब तक और कितनी वाह-वाह करते रहें।
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