ग़ज़ल
मा'नी को भुला देती है सूरत है तो ये है
معنی کو بھلا دیتی ہے صورت ہے تو یہ ہے
यह ग़ज़ल हुस्न और आधुनिकता के प्रभाव पर एक मनोरंजक और व्यंग्यात्मक टिप्पणी है। शायर ने चुलबुले अंदाज़ में दर्शाया है कि किस तरह ज़ाहिरी ख़ूबसूरती संजीदा इल्म और अर्थ पर हावी होकर सबको मुग्ध कर देती है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
मा'नी को भुला देती है सूरत है तो ये है
नेचर भी सबक़ सीख ले ज़ीनत है तो ये है
2
कमरे में जो हँसती हुई आई मिस-ए-राना
टीचर ने कहा इल्म की आफ़त है तो ये है
3
ये बात तो अच्छी है कि उल्फ़त हो मिसों से
हूर उन को समझते हैं क़यामत है तो ये है
4
पेचीदा मसाइल के लिए जाते हैं इंग्लैण्ड
ज़ुल्फ़ों में उलझ आते हैं शामत है तो ये है
5
पब्लिक में ज़रा हाथ मिला लीजिए मुझ से
साहब मिरे ईमान की क़ीमत है तो ये है
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