ग़ज़ल

गले लगाएँ करें प्यार तुम को ईद के दिन

گلے لگائیں کریں پیار تم کو عید کے دن
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 8 shers· radif: ईद के दिन

यह ग़ज़ल ईद के पावन पर्व पर प्रेम और मिलन के उल्लास को दर्शाती है। शायर अपने महबूब के क़यामत-ख़ेज़ हुस्न और शृंगार की दिलकश तारीफ़ करते हुए इस मुबारक दिन पर उन्हें गले लगाने और प्यार बाँटने की तमन्ना ज़ाहिर करता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
गले लगाएँ करें प्यार तुम को ईद के दिन इधर तो आओ मिरे गुल-एज़ार ईद के दिन
2
ग़ज़ब का हुस्न है आराइशें क़यामत की अयाँ है क़ुदरत-ए-परवरदिगार ईद के दिन
3
सँभल सकी न तबीअ'त किसी तरह मेरी रहा न दिल पे मुझे इख़्तियार ईद के दिन
4
वो साल भर से कुदूरत भरी जो थी दिल में वो दूर हो गई बस एक बार ईद के दिन
5
लगा लिया उन्हें सीने से जोश-ए-उल्फ़त में ग़रज़ कि आ ही गया मुझ को प्यार ईद के दिन
6
कहीं है नग़्मा-ए-बुलबुल कहीं है ख़ंदा-ए-गुल अयाँ है जोश-ए-शबाब-ए-बहार ईद के दिन
7
सिवय्याँ दूध शकर मेवा सब मुहय्या है मगर ये सब है मुझे नागवार ईद के दिन
8
मिले अगर लब-ए-शीरीं का तेरे इक बोसा तो लुत्फ़ हो मुझे अलबत्ता यार ईद के दिन
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