ग़ज़ल

फिर गई आप की दो दिन में तबीअ'त कैसी

پھر گئی آپ کی دو دن میں طبیعت کیسی
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 6 shers· radif: कैसी

इस ग़ज़ल में महबूब के अचानक बदले हुए मिज़ाज और उसकी बेवफ़ाई पर सवाल उठाया गया है। साथ ही, शायर अपनी मस्त-मौला तबीयत का इज़हार करते हुए कहता है कि वह दोस्तों के साथ रहकर जुदाई का दर्द भी आसानी से सह लेगा।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
फिर गई आप की दो दिन में तबीअ'त कैसी ये वफ़ा कैसी थी साहब ये मुरव्वत कैसी
2
दोस्त अहबाब से हँस बोल के कट जाएगी रात रिंद-ए-आज़ाद हैं हम को शब-ए-फ़ुर्क़त कैसी
3
जिस हसीं से हुई उल्फ़त वही माशूक़ अपना इश्क़ किस चीज़ को कहते हैं तबीअ'त कैसी
4
है जो क़िस्मत में वही होगा न कुछ कम न सिवा आरज़ू कहते हैं किस चीज़ को हसरत कैसी
5
हाल खुलता नहीं कुछ दिल के धड़कने का मुझे आज रह रह के भर आती है तबीअ'त कैसी
6
कूचा-ए-यार में जाता तो नज़ारा करता क़ैस आवारा है जंगल में ये वहशत कैसी
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