غزل

आए हैं 'मीर' काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में

आए हैं 'मीर' काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में
میر تقی میر· Ghazal· 9 shers

یہ غزل ایک طنزیہ اور خود آگاہی والے انداز میں ہے، جس میں شاعر 'میر' اپنے آپ کو خدا کے گھر میں کافر بن کر آنے کا بیان کرتا ہے۔ یہ عشق اور زندگی کے گہرے درد کو پیش کرتی ہے، جہاں ایک حسن کی خوبصورتی اور درد کی شدت دونوں دل کو بہکاوٹ کرتی ہیں۔ یہ درواقعی انسانی ذہن کی پیچیدگی اور روحانی عدم مطابقت پر ایک غور و فکر ہے۔

نغمہ سنیں
رسم الخط
1
आए हैं 'मीर' काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में पेशानी पर है क़श्क़ा ज़ुन्नार है कमर में
آئے ہیں میرؔ کافر ہو کر خدا کے گھر میں پیشانی پر ہے قشقہ زنار ہے کمر میں
मीर काफ़िर बनकर ख़ुदा के घर आ गए हैं; उनके माथे पर झूठा तिलक है और कमर में झूठी माला है।
2
नाज़ुक बदन है कितना वो शोख़-चश्म दिलबर जान उस के तन के आगे आती नहीं नज़र में
نازک بدن ہے کتنا وہ شوخ چشم دلبر جان اس کے تن کے آگے آتی نہیں نظر میں
वो दिलबर जिसका बदन नाज़ुक है और आँखें शोख़ हैं, उसके शरीर की खूबसूरती के सामने तो जान भी निगाहों में नहीं आती।
3
सीने में तीर उस के टूटे हैं बे-निहायत सुराख़ पड़ गए हैं सारे मिरे जिगर में
سینے میں تیر اس کے ٹوٹے ہیں بے نہایت سوراخ پڑ گئے ہیں سارے مرے جگر میں
उसके टूटे हुए तीर अनगिनत हैं जो मेरे सीने में लगे हैं, और मेरा जिगर पूरी तरह से छेदों से भर गया है।
4
आइंदा शाम को हम रोया कुढ़ा करेंगे मुतलक़ असर न देखा नालीदन-ए-सहर में
آئندہ شام کو ہم رویا کڑھا کریں گے مطلق اثر نہ دیکھا نالیدن سحر میں
अब से मैं शाम को रोकर दुखी होने लगा हूँ क्योंकि सुबह की नाली में कोई स्थायी असर नहीं देखा।
5
बे-सुध पड़ा रहूँ हूँ उस मस्त-ए-नाज़ बिन मैं आता है होश मुझ को अब तो पहर पहर में
بے سدھ پڑا رہوں ہوں اس مست ناز بن میں آتا ہے ہوش مجھ کو اب تو پہر پہر میں
बिना उस मदहोश नज़ाकत वाले महबूब के मैं बेसुध पड़ा रहता हूँ; मेरा होश अब तो हर कुछ घंटों के अंतराल पर आता है।
6
सीरत से गुफ़्तुगू है क्या मो'तबर है सूरत है एक सूखी लकड़ी जो बू न हो अगर में
سیرت سے گفتگو ہے کیا معتبر ہے صورت ہے ایک سوکھی لکڑی جو بو نہ ہو اگر میں
शायर कह रहे हैं कि किसी के चरित्र से बात करना अधिक महत्वपूर्ण है, न कि उसकी बाहरी सूरत से। वे कहते हैं कि यह एक सूखी लकड़ी के समान है जिसमें आग लगाने पर कोई खुशबू नहीं निकलती।
7
हम-साया-ए-मुग़ाँ में मुद्दत से हूँ चुनाँचे इक शीरा-ख़ाने की है दीवार मेरे घर में
ہمسایۂ مغاں میں مدت سے ہوں چنانچہ اک شیرہ خانے کی ہے دیوار میرے گھر میں
मुग़ाँ (यानी शराबखाने) के साये में बहुत समय से रहने के कारण, मेरे घर में एक दीवार असल में एक शायर के मकान की ही दीवार है।
8
अब सुब्ह ओ शाम शायद गिर्ये पे रंग आवे रहता है कुछ झमकता ख़ूनाब चश्म-ए-तर में
اب صبح و شام شاید گریے پہ رنگ آوے رہتا ہے کچھ جھمکتا خوناب چشم تر میں
शायर कहता है कि शायद सुबह और शाम को उसके आँसुओं में रंग आ जाए, लेकिन अभी भी उसकी नम आँखों में खूनी आँसुओं की एक हल्की चमक बाकी है।
9
आलम में आब-ओ-गिल के क्यूँकर निबाह होगा अस्बाब गिर पड़ा है सारा मिरा सफ़र में
عالم میں آب و گل کے کیونکر نباہ ہوگا اسباب گر پڑا ہے سارا مرا سفر میں
इस दुनिया की उथल-पुथल में मेरा गुज़ारा कैसे होगा? मेरा सारा सामान और सब कुछ मेरे सफ़र में बिखर गया है।
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