ग़ज़ल

वो नाज़नीं अदा में एजाज़ है सरापा

وہ نازنیں ادا میں اعجاز ہے سراپا
वली दकनी· Ghazal· 6 shers· radif: है सरापा

इस ग़ज़ल में शायर ने अपनी महबूबा के बेमिसाल हुस्न, नाज़-ओ-अंदाज़ और जादुई आकर्षण की भावपूर्ण प्रशंसा की है। वह माशूक़ा को सभी रूपवानों में सर्वश्रेष्ठ बताते हुए उसकी क़ातिलाना निगाहों और दिलकश अदाओं के सम्मोहन को सुंदर ढंग से व्यक्त करता है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
वो नाज़नीं अदा में एजाज़ है सरापा ख़ूबी में गुल-रुख़ाँ सूँ मुम्ताज़ है सरापा
वह नाज़ुक महबूब अपनी अदा और अंदाज़ में सिर से पाँव तक एक चमत्कार है, और अपनी ख़ूबसूरती में सभी गुलाब जैसे चेहरे वालों से पूरी तरह श्रेष्ठ और अलग है।
2
ऐ शोख़ तुझ नयन में देखा निगाह कर कर आशिक़ के मारने का अंदाज़ है सरापा
ऐ शोख़ माशूक़, तुम्हारी आँखों में ग़ौर से देखने पर यही नज़र आता है कि तुम्हारा पूरा अंदाज़ आशिक़ को मार डालने के लिए ही बना है।
3
जग के अदा-शनासाँ है जिन की फ़िक्र आली तुझ क़द कूँ देख बोले यू नाज़ है सरापा
दुनिया के हाव-भाव और नज़ाकत को समझने वाले, जिनकी सोच बहुत ऊँची है, तुम्हारे कद को देखकर कहते हैं कि तुम सिर से पैर तक सरासर नाज़-ओ-अंदाज़ का ही रूप हो।
4
क्यूँ हो सकें जगत के दिलबर तिरे बराबर तू हुस्न हौर अदा में एजाज़ है सरापा
इस दुनिया के महबूब तुम्हारी बराबरी कैसे कर सकते हैं? तुम अपनी सुंदरता और अदाओं में सिर से पाँव तक एक चमत्कार हो।
5
गाहे ऐ ईसवी-दम यक बात लुत्फ़ सूँ कर जाँ-बख़्श मुझ को तेरा आवाज़ है सरापा
हे ईसा जैसी जीवनदायिनी सांस वाले प्रियतम, कभी तो कृपा करके मुझसे एक बात करो। तुम्हारी आवाज़ पूरी तरह से मुझे नया जीवन देने वाली है।
6
मुझ पर 'वली' हमेशा दिलदार मेहरबाँ है हर-चंद हस्ब-ए-ज़ाहिर तन्नाज़ है सरापा
ऐ वली, मेरा महबूब हमेशा मुझ पर दयालु और मेहरबान रहता है, भले ही ज़ाहिरी तौर पर वह सिर से पाँव तक नख़रेबाज़ और इतराने वाला दिखता हो।
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