ग़ज़ल

तिरा मजनूँ हूँ सहरा की क़सम है

ترا مجنوں ہوں صحرا کی قسم ہے
वली दकनी· Ghazal· 7 shers· radif: की क़सम है

इस ग़ज़ल में आशिक़ अपने बेपनाह इश्क़ और समर्पण का इज़हार करते हुए सहरा और अपनी तलब की क़सम खाता है। ख़ुद को मजनूँ के रूप में प्रस्तुत करते हुए शायर अपने परी-चेहरा माशूक़ के हुस्न, नाज़ और पूरे सरापा की दिलकश तारीफ़ करता है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
तिरा मजनूँ हूँ सहरा की क़सम है तलब में हूँ तमन्ना की क़सम है
मैं तुम्हारा मजनूँ (दीवाना) हूँ, मुझे रेगिस्तान की क़सम है; मैं तुम्हारी ही तलाश और चाहत में हूँ, मुझे तमन्ना की क़सम है।
2
सरापा नाज़ है तू ऐ परी-रू मुझे तेरे सरापा की क़सम है
ऐ परी जैसे चेहरे वाली, तू सिर से पैर तक नाज़-ओ-अंदाज़ का सरापा है। मुझे तेरे सिर से पैर तक के इस पूरे हुस्न की क़सम है।
3
दिया हक़ हुस्न-ए-बाला-दस्त तुजकूं मुझे तुझ सर्व-ए-बाला की क़सम है
ईश्वर ने तुम्हें सर्वोच्च और श्रेष्ठ सौंदर्य प्रदान किया है; मुझे तुम्हारे ऊँचे, सर्व जैसे सुंदर क़द की क़सम है।
4
किया तुझ ज़ुल्फ़ ने जग कूँ दिवाना तिरी ज़ुल्फ़ाँ के सौदा की क़सम है
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों ने सारी दुनिया को दीवाना बना दिया है, और मुझे तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के इस दीवानेपन की क़सम है।
5
दो-रंगी तर्क कर हर इक से मत मिल तुझे तुझ क़द्द-ए-राना की क़सम है
यह दोहरापन छोड़ दो और हर किसी से मत मिला करो; तुम्हें तुम्हारे अपने सुंदर और आकर्षक क़द की क़सम है।
6
किया तुझ इश्क़ ने आलम कूँ मजनूँ मुझे तुझ रश्क-ए-लैला की क़सम है
तुम्हारे प्रेम ने सारी दुनिया को मजनूं की तरह दीवाना बना दिया है; मुझे तुम्हारी क़सम है, जिसके हुस्न पर लैला को भी रश्क होता है।
7
'वली' मुश्ताक़ है तेरी निगह का मुझे तुझ चश्म-ए-शहला की क़सम है
वली तुम्हारी एक नज़र का तलबगार है, और मुझे तुम्हारी ख़ूबसूरत, नशीली आँखों की क़सम है।
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