दो-रंगी तर्क कर हर इक से मत मिल — वली दकनी

दो-रंगी तर्क कर हर इक से मत मिल तुझे तुझ क़द्द-ए-राना की क़सम है

“Renounce this duplicity, mingle not with every soul; I swear unto you by the grace of your stately stature.”

— वली दकनी

अर्थ

यह दोहरापन छोड़ दो और हर किसी से मत मिला करो; तुम्हें तुम्हारे अपने सुंदर और आकर्षक क़द की क़सम है।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ अपने महबूब से बड़ी नज़ाकत और शिकवे के साथ इल्तिजा कर रहा है कि वह यह दोहरापन छोड़े और हर किसी से राब्ता न बढ़ाए। वह महबूब को उसी के 'क़द्द-ए-राना' यानी दिलकश और मग़रूर क़द-ओ-क़ामत की क़सम देता है, मानो याद दिला रहा हो कि इतने ऊंचे हुस्न वाले को आम लोगों से उलझना शोभा नहीं देता। यहाँ प्यार में जलने वाली रश्क भी है और महबूब के रुतबे का गहरा एहसास भी।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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