ग़ज़ल

आग अश्क-ए-गर्म को लगी जी क्या ही जल गया

اگ اشک گرم کو لگی جی کیا ہی جل گیا

Source: Kulliyat-e-Momin (old lithograph edition) · HI

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
आग अश्क-ए-गर्म को लगी जी क्या ही जल गया आँसू जो उसे पोंछे शब और हाथ फिसल गया
गर्म आँसुओं में आग लग गई और दिल पूरी तरह जल गया; रात को जब उन आँसुओं को पोंछना चाहा तो हाथ फिसल गया।
2
फोड़ा था दिल न था यह सू-ए-पुर-ख़लल गया जब नहीं साँस की लगी दम ही निकल गया
यह दिल नहीं बल्कि एक फोड़ा था, जो दोष और विकार से भरा हुआ था; जब साँस ने साथ नहीं दिया तो दम ही निकल गया और जान चली गई।
3
क्या रोऊँ ख़ीरा-चश्मी-ए-बख़्त-ए-सियाह को वहाँ शुग़्ल-ए-सुरमा ही यही इन नील डल गया
मैं अपने काले भाग्य के ढीठ अंधेपन पर क्या रोऊँ, जहाँ सुरमा लगाने का शौक़ ही इन नीले निशानों के रूप में पड़ गया।
4
की मुझको माथा मलने की तालीम वरना क्यों ग़ैरों को आगे बज़्म में वह इत्र मल गया
क्या मुझे माथा मलने की सीख देने के लिए, वरना उसने महफ़िल में सबके सामने वह इत्र मेरे प्रतिद्वंद्वियों को क्यों मला।
5
उस कूचा की हवा थी कि मेरी ही आह थे कोई तो दिल की आग की पंखा सा झल गया
क्या वह उस गली की हवा थी या मेरी ही आहें थीं; किसी ने पंखे की तरह मेरे दिल की आग को हवा देकर भड़का दिया।
6
ज्यों ख़ुफ़्तगान-ए-ख़ाक ही अपनी उफ़्तादगी आया जो ज़लज़ला कहिए करवट बदल गया
जैसे मिट्टी में सोए हुए लोग अपनी गिरी हुई हालत में पड़े रहते हैं, जब भूकंप आया तो कह लीजिए कि वे बस करवट बदल गए।
7
उस नक़्श-ए-पा की सजदा ने क्या क्या किया ज़लील मैं गोचा-ए-रक़ीब में ही सर के बल गया
उस पाँव के निशान को सजदा करने ने मुझे कितना ज़लील किया; मैं अपने रक़ीब के ही कोने में सिर के बल जा गिरा।
8
कुछ जी गिरा पड़ी था पर अब तो ने नाज़ से मुझको गिरा दिया तो मेरा जी सँभल गया
मेरा दिल कुछ गिरा-पड़ा सा था, पर अब जब तूने नाज़ से मुझे गिरा दिया, तो मेरा दिल सँभल गया।
9
मिल जाए गर यह ख़ाक में उसने मान की ख़ाक गुल की थी क्यों कि पाँव वह नाज़ुक फिसल गया
यदि उसके घमंड की धूल इस मिट्टी में मिल जाए, तो फिर वह नाज़ुक पाँव फूल पर क्यों फिसल गया?
10
तजा न से न काबा की तकलीफ़ दी मुझे मोमिन बस अबआफ़ कि यहाँ जी बहल गया
न तो उन्होंने मुझे छोड़ा और न ही काबा जाने की तकलीफ़ दी—बस, ऐ मोमिन, अब शिकायत छोड़ दो, यहीं मेरा दिल बहल गया।
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