ज्यों ख़ुफ़्तगान-ए-ख़ाक ही अपनी उफ़्तादगी — मोमिन ख़ाँ मोमिन

ज्यों ख़ुफ़्तगान-ए-ख़ाक ही अपनी उफ़्तादगी आया जो ज़लज़ला कहिए करवट बदल गया

“Like those who sleep within the dust, lost in their fallen state, When the earthquake came, you might say, they merely turned their side.”

— मोमिन ख़ाँ मोमिन

अर्थ

जैसे मिट्टी में सोए हुए लोग अपनी गिरी हुई हालत में पड़े रहते हैं, जब भूकंप आया तो कह लीजिए कि वे बस करवट बदल गए।

विस्तार

ज़रा उन लोगों की कल्पना कीजिए जो मिट्टी के नीचे सोए हुए हैं, अपनी गिरी हुई, विनम्र हालत में पड़े हैं। शायर कहते हैं कि वे इतने बेबस और स्थिर हैं कि अपने आप हिल भी नहीं सकते। जब आख़िरकार भूकंप आता है, तो कहिए कि उसने बस उन्हें करवट दिला दी, एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ होने का मौक़ा दे दिया। यह उनकी गहरी नींद और लाचारी की एक कोमल, कुछ व्यंग्य भरी तस्वीर है। धरती का इतना बड़ा हिलना भी उन्हें बस पहलू बदलने देता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। यह शेर मौत, ठहराव और मिट्टी से बँधे रहने के उस शांत एहसास पर सोचने को कहता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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