ग़ज़ल
वो देखने हमें टुक बीमारी में न आया
वो देखने हमें टुक बीमारी में न आया
यह ग़ज़ल एक प्रियजन के न आने के कारण उत्पन्न हुई पीड़ा और निराशा को व्यक्त करती है। शायर कहता है कि वह देखने के लिए न तो बीमार हुआ और न ही किसी कारण से आया। वह अपने प्रेम और विरह की गहन भावना को व्यक्त करते हुए, उस व्यक्ति के अप्रत्याशित व्यवहार और उपेक्षा पर तंज कसता है।
गीत सुनें
1
वो देखने हमें टुक बीमारी में न आया
सौ बार आँखें खोलीं बालीं से सर उठाया
वो देखने हमें टुक बीमारी में न आया, सौ बार आँखें खोलीं बालीं से सर उठाया। (अर्थात, तुम बीमारी में देखने नहीं आए, जबकि तुमने बचपन में बहुत प्रयास किए।)
2
गुलशन के ताएरों ने क्या बे-मुरव्वती की
यक बर्ग-ए-गुल क़फ़स में हम तक न कोई लाया
फूलों के बगीचों ने क्या बेरुख़ी दिखाई, एक फूल का पत्ता भी गुल के पिंजरे में हम तक कोई नहीं लाया।
3
बे-हेच उस का ग़ुस्सा यारो बला-ए-जाँ है
हरगिज़ मना न हम से बहतेरा ही मनाया
अर्थात, मित्रों, उसका क्रोध बहुत खतरनाक है; हमें कभी मना न करना, क्योंकि हम तो बस मनाए जाने के लिए ही बने हैं।
4
क़द्द-ए-बुलंद अगरचे बे-लुत्फ़ भी नहीं है
सर्व-ए-चमन में लेकिन अंदाज़ा वो न पाया
अगर ऊँचा काव्य भले ही न शालीन हो, फिर भी वह पूरे बाग़ की शोभा का अंदाज़ा नहीं लगा सका।
5
नक़्शा अजब है उस का नक़्क़ाश ने अज़ल के
मतबू ऐसा चेहरा कोई न फिर बनाया
इसका नक़्शा अद्भुत है, जिसके नक़्क़ाश ने युगों के आरंभ से ऐसा कोई चेहरा नहीं बनाया।
6
शब को नशे में बाहम थी गुफ़्तुगू-ए-दरहम
उस मस्त ने झँकाया यानी बहुत झुकाया
रात नशे में दिल की बातें करने को मगन थी, पर उस मस्त ने बस झँकाया, यानी बहुत झुका दिया।
7
दिल-बस्तगी में खुलना उस का न उस से देखा
बख़्त-ए-निगूँ को हम ने सौ बार आज़माया
उसके न होने पर उसके दिल का खुलना देखा, और हमने उसकी निगाह के भाग्य को सौ बार परखा।
8
आशिक़ जहाँ हुआ है बे-ढंगियाँ ही की हैं
इस मीर-ए-बे-ख़िरद ने कब ढब से दिल लगाया
हे आशिक़! तुमने जो बेढंगियाँ की हैं, यह मीर-ए-बे-ख़िरद ने कब ढंग से दिल लगाया?
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