ग़ज़ल
पाए ख़िताब क्या क्या देखे इ'ताब क्या क्या
पाए ख़िताब क्या क्या देखे इ'ताब क्या क्या
ये ग़ज़ल जीवन के अनुभवों और कष्टों के विभिन्न पहलुओं पर विचार करती है, जिसमें कवि ने पूछा है कि क्या हासिल किया और क्या देखा। इसमें दिल को आज़ाब देने वाले और जीवन की कठिनाइयों से गुज़रने के बाद भी कौन से बदलाव आए। यह जीवन की अनिश्चितताओं और कर्मों के हिसाब-किताब के विषय को छूती है।
गीत सुनें
1
पाए ख़िताब क्या क्या देखे इ'ताब क्या क्या
दिल को लगा के हम ने खींचे अज़ाब क्या क्या
क्या उपाधियाँ और क्या दृश्य तुमने देखे? क्या यातनाएं सहा हैं? दिल से लगाकर हमने क्या कष्ट खींचे हैं।
2
काटे हैं ख़ाक उड़ा कर जों गर्द-बाद बरसों
गलियों में हम हुए हैं उस बिन ख़राब क्या क्या
काटे हैं धूल उड़ाकर जैसे झाड़ू से, और गलियों में हमने उस व्यक्ति के बिना क्या-क्या खराब कर दिया।
3
कुछ गुल से हैं शगुफ़्ता कुछ सर्व से हैं क़द-कश
उस के ख़याल में हम देखे हैं ख़्वाब क्या क्या
कुछ फूल से महकते हैं, कुछ अपनी उपस्थिति से आकर्षक हैं। उसके ख़याल में हमने क्या-क्या सपने देखे हैं।
4
अन्वा-ए-जुर्म मेरे फिर बे-शुमार-ओ-बे-हद
रोज़-ए-हिसाब लेंगे मुझ से हिसाब क्या क्या
मेरे पापों के धब्बेदार नदियाँ, जो अनगिनत और असीमित हैं, हिसाब के दिन तुम मुझसे क्या हिसाब मांगते हो?
5
इक आग लग रही है सीनों में कुछ न पूछो
जल जल के हम हुए हैं उस बिन कबाब क्या क्या
सीनों में एक आग जल रही है, इसके बारे में मत पूछो। हम तुम्हारे लिए रो-रो कर हुए हैं, तो कबाब का क्या मोल?
6
इफ़रात-ए-शौक़ में तो रूयत रही न मुतलक़
कहते हैं मेरे मुँह पर अब शैख़-ओ-शाब क्या क्या
इफ़रात-ए-शौक़ में तो दृष्टि लगातार नहीं रही, वे कहते हैं मेरे चेहरे पर अब शैख़-ओ-शाब क्या हैं।
7
फिर फिर गया है आ कर मुँह तक जिगर हमारे
गुज़रे हैं जान-ओ-दिल पर याँ इज़्तिराब क्या क्या
तुम बार-बार आए हो और हमारे मुँह तक जिगर को छू गए हैं। हमारे जान-ओ-दिल पर यह कैसी बेचैनी या व्याकुलता है?
8
आशुफ़्ता उस के गेसू जब से हुए हैं मुँह पर
तब से हमारे दिल को है पेच-ओ-ताब क्या क्या
जब से आपके बाल आपके चेहरे पर बिखरे हैं, तब से हमारे दिल में क्या-क्या उलझनें और बेचैनी आ गई है।
9
कुछ सूझता नहीं है मस्ती में 'मीर'-जी को
करते हैं पोच-गोई पी कर शराब क्या क्या
मस्ती में 'मीर'-जी को समझ नहीं आता कि शराब पीकर क्या-क्या शैतानी की जाती है।
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