इफ़रात-ए-शौक़ में तो रूयत रही न मुतलक़ — मीर तक़ी मीर
“In the excess of longing, sight was not constant, They say, what are the Sheikhs and the night on my face now?”
अर्थ
इफ़रात-ए-शौक़ में तो दृष्टि लगातार नहीं रही, वे कहते हैं मेरे चेहरे पर अब शैख़-ओ-शाब क्या हैं।
विस्तार
यह शेर उस गहरे सफर को बयां करता है जो इश्क़ की आग से निकलकर ज़िंदगी की समझ बन जाता है। शायर कहते हैं कि मेरा जुनून कितना भी ज़्यादा क्यों न था, मेरी निगाहें कभी स्थिर नहीं थीं। लेकिन अब लोग मेरे मुँह पर ये बात कहते हैं... कि मेरे अनुभवों का रंग देखिए, ये दिन और रात की कहानी है! यह सिर्फ़ महबूब की बात नहीं, बल्कि वक़्त के गुज़र जाने की बात है।
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