अन्वा-ए-जुर्म मेरे फिर बे-शुमार-ओ-बे-हद — मीर तक़ी मीर
अन्वा-ए-जुर्म मेरे फिर बे-शुमार-ओ-बे-हद
रोज़-ए-हिसाब लेंगे मुझ से हिसाब क्या क्या
“The sin-stained rivers of my life, countless and boundless, What reckoning do you ask of me, on the day of account?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
मेरे पापों के धब्बेदार नदियाँ, जो अनगिनत और असीमित हैं, हिसाब के दिन तुम मुझसे क्या हिसाब मांगते हो?
विस्तार
यह शेर हिसाब-किताब और गुनाहों के बोझ को बहुत गहराई से छूता है। शायर कहते हैं कि मेरे गुनाह तो बे-शुमार और बे-हद हैं। लेकिन फिर वह सवाल करते हैं कि क़यामत के दिन, मुझसे क्या-क्या हिसाब लिया जाएगा? यह सिर्फ़ गुनाहों का इक़रार नहीं है, बल्कि एक तरह की चुनौती है.... कि मेरी ज़िम्मेदारी कितनी होगी!
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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