काटे हैं ख़ाक उड़ा कर जों गर्द-बाद बरसों — मीर तक़ी मीर

काटे हैं ख़ाक उड़ा कर जों गर्द-बाद बरसों गलियों में हम हुए हैं उस बिन ख़राब क्या क्या

“Having scattered the dust by cutting (our ties) like a broom, how many things have we ruined in the streets, without that (person's presence)?”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

काटे हैं धूल उड़ाकर जैसे झाड़ू से, और गलियों में हमने उस व्यक्ति के बिना क्या-क्या खराब कर दिया।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर की ज़िंदगी और मोहब्बत के दर्द को बयां करता है। शायर कहते हैं कि हमने तो बरसों गुज़ारे हैं, हर मुश्किल, हर तूफ़ान का सामना किया है। लेकिन जब वह एहसास होता है कि उस महबूब के बिना जीना भी एक तरह की तबाही है... तो सारी दुनिया की तकलीफें फीकी पड़ जाती हैं। यह वियोग का एक बहुत ही गहरा नज़रिया है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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