ग़ज़ल

ग़ुस्से से उठ चले हो तो दामन को झाड़ कर

ग़ुस्से से उठ चले हो तो दामन को झाड़ कर

यह ग़ज़ल बताती है कि यदि आप ग़ुस्से में उठते हैं, तो अपने व्यवहार के पलों को झाड़ देना चाहिए। वक्ता कहता है कि दिल कोई ऐसा शहर नहीं है जो फिर से आबाद हो जाए, और पछतावा होगा अगर आपने इस बस्ती को उजाड़ दिया। वह प्रेम की तलब में भटकते रहने के बजाय, शांति पाने के लिए कहीं बैठ जाना बेहतर है, और अगर आप पास नहीं हो सकते, तो दूर से ही आप को ताड़ना स्वीकार्य है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
ग़ुस्से से उठ चले हो तो दामन को झाड़ कर जाते रहेंगे हम भी गरेबान फाड़ कर
यदि तुम क्रोध से उठकर चले जाओ, तो हम भी पर्दा झाड़कर जाते रहेंगे।
2
दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके पछताओगे सुनो हो ये बस्ती उजाड़ कर
दिल कोई ऐसा नगर नहीं कि उजाड़ करने के बाद फिर से आबाद हो सके। इसलिए, यह मत पछताना कि तुमने इस बस्ती को उजाड़ कर दिया।
3
यारब रह-ए-तलब में कोई कब तलक फिरे तस्कीन दे कि बैठ रहूँ पाँव गाड़ कर
दोस्त, तेरे आनंद की इस खोज में मैं कब तक भटकता रहूँ? थोड़ा सुकून दे कि मैं बैठकर आराम कर सकूँ।
4
मंज़ूर हो न पास हमारा तो हैफ़ है आए हैं आज दूर से हम तुझ को ताड़ कर
अगर हमारी मौजूदगी स्वीकार न हो, तो हम अब जा रहे हैं। आज हम दूर से आपको ढूँढने आए हैं।
5
ग़ालिब कि देवे क़ुव्वत-ए-दिल इस ज़ईफ़ को तिनके को जो दिखावे है पल में पहाड़ कर
शायर गालिब से कहते हैं कि इस कमज़ोर दिल को शक्ति दें, ताकि वह पल भर में तिनके से पहाड़ जैसा कुछ दिखा सके।
6
निकलेंगे काम दिल के कुछ अब अहल-ए-रीश से कुछ ढेर कर चुके हैं ये आगे उखाड़ कर
दिल के कुछ काम अब अहल-ए-रीश से निकलेंगे; कुछ ढेर कर चुके हैं ये आगे उखाड़ कर।
7
उस फ़न के पहलवानों से कश्ती रही है 'मीर' बहुतों को हम ने ज़ेर किया है पछाड़ कर
उस कला के पहलवानों से अभी भी कश्ती बची है, ऐ मीर। हमने बहुतों को पछाड़कर हराया है।
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