यारब रह-ए-तलब में कोई कब तलक फिरे — मीर तक़ी मीर

यारब रह-ए-तलब में कोई कब तलक फिरे तस्कीन दे कि बैठ रहूँ पाँव गाड़ कर

“Friend, in this quest for your pleasure, how long must I wander? Grant some solace, that I may sit down and rest.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

दोस्त, तेरे आनंद की इस खोज में मैं कब तक भटकता रहूँ? थोड़ा सुकून दे कि मैं बैठकर आराम कर सकूँ।

विस्तार

यह शेर खोज और चाहत में थकावट को बयां करता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर पूछ रहे हैं, 'ये तलब का रास्ता कब तक भटकना पड़ेगा?' यह सिर्फ़ सफ़र नहीं है, यह मन की वह थकान है जो लगातार उम्मीदों के पीछे भागने से होती है। शायर बस एक पल की शांति मांग रहे हैं... एक जगह जहाँ वो बैठकर अपने दिल को सुकून दे सकें।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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