ग़ज़ल

आवेगी मेरी क़ब्र से आवाज़ मेरे बा'द

आवेगी मेरी क़ब्र से आवाज़ मेरे बा'द

यह ग़ज़ल जीवन की क्षणभंगुरता और मृत्यु के बाद भी प्रेम की अमरता का भाव व्यक्त करती है। शायर कहते हैं कि उनकी क़ब्र से भी एक दिन उनकी आवाज़ आएगी, और उनके वियोग में भी प्रेम की यादें और शिकायतें बनी रहेंगी। यह जीवन की नश्वरता के बावजूद, प्रेम की निरंतर उपस्थिति और उसके प्रभाव को दर्शाती है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
आवेगी मेरी क़ब्र से आवाज़ मेरे बा'द उभरेंगे इश्क़-ए-दिल से तिरे राज़ मेरे बा'द
आवेगी मेरी क़ब्र से आवाज़ मेरे बा'द, और इश्क़-ए-दिल से तिरे राज़ मेरे बा'द उभरेंगे।
2
जीना मिरा तो तुझ को ग़नीमत है ना-समझ खींचेगा कौन फिर ये तिरे नाज़ मेरे बा'द
मेरा जीवन तो तुम्हें सौभाग्य है, नासमझ, फिर मेरे नखरों को कौन खींचेगा जब मैं चली जाऊँगा।
3
शम-ए-मज़ार और ये सोज़-ए-जिगर मिरा हर शब करेंगे ज़िंदगी ना-साज़ मेरे बा'द
कब्र की खुशबू और मेरे जिगर का यह जलन, हर रात मेरे बेसुरी जीवन को नष्ट करेंगे।
4
हसरत है इस के देखने की दिल में बे-क़यास अग़्लब कि मेरी आँखें रहें बाज़ मेरे बा'द
मेरे दिल में इस चीज़ को देखने की एक बे-क़यास चाहत है कि मेरे जाने के बाद भी मेरी आँखें चौकन्नी रहें।
5
करता हूँ मैं जो नाले सर-अंजाम बाग़ में मुँह देखो फिर करेंगे हम आवाज़ मेरे बा'द
मैं जो कार्य नाले से लेकर अंजाम तक बाग़ में करता हूँ, देख, फिर मैं चला गया तो मेरे बाद आवाज़ करेंगे।
6
बिन गुल मुआ ही मैं तो प तू जा के लौटियो सेहन-ए-चमन में ऐ पर-ए-पर्वाज़ मेरे बा'द
बिना फूल के मैं तो बस एक पतंगा हूँ; मेरे दिल के बाग में वापस लौट आओ, ऐ उड़ान के पंख।
7
बैठा हूँ 'मीर' मरने को अपने में मुस्तइद पैदा न होंगे मुझ से भी जाँबाज़ मेरे बा'द
मैं 'मीर' अपने आप को मरने के लिए तैयार बैठा हूँ; मेरे बाद कोई भी जाँबाज़ पैदा नहीं होगा।
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