ग़ज़ल

कसरत-ए-दाग़ से दिल रश्क-ए-गुलिस्ताँ न हुआ

कसरत-ए-दाग़ से दिल रश्क-ए-गुलिस्ताँ न हुआ

इस ग़ज़ल में शायर कहता है कि दाग़ की अधिकता से दिल में बाग़ का ईर्ष्या भाव नहीं हुआ, और उसने अपने दिल में जो कुछ चाहा, वह कभी पूरा नहीं हुआ। शायर ने महबूब पर कई वफ़ादारी की बातें कीं, पर वह तनिक भी शर्मिंदा नहीं हुआ। वह यह भी कहता है कि उसकी आह से नर्क की संपत्ति नहीं हुई, और उसके आँसू से तूफ़ान का मज़ा नहीं हुआ। अंत में, वह कहता है कि दुनिया की महत्ता से उसे कोई धन-दौलत नहीं मिली।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
कसरत-ए-दाग़ से दिल रश्क-ए-गुलिस्ताँ न हुआ मेरा दिल ख़्वाह जो कुछ था वो कभू याँ न हुआ
दाग़ की अधिक मेहनत से दिल बाग़ का नक़ल नहीं बना; / मेरा दिल जो भी चाहता था, वह कभी नहीं हुआ।
2
जी तो ऐसे कई सदक़े किए तुझ पर लेकिन हैफ़ ये है कि तनिक तू भी पशेमाँ न हुआ
अर्थात, मैंने तुम्हारे लिए इतने सारे बलिदान दिए, लेकिन दुख की बात यह है कि तुम भी थोड़े से पछतावे में नहीं आए।
3
आह में कब की कि सर्माया-ए-दोज़ख़ न हुई कौन सा अश्क मिरा मम्बा-ए-तूफ़ाँ न हुआ
आह में कब की कि नर्क का श्रृंगार हो गई, कौन सा आँसू मेरा तूफ़ान की लहर नहीं था।
4
गो तवज्जोह से ज़माने की जहाँ में मुझ को जाह-ओ-सर्वत का मयस्सर सर-ओ-सामाँ न हुआ
हे तवज्जोह, मुझे इस दुनिया में जीने की कृपा दे, पर मुझे दुनिया की शोहरत और धन-दौलत का कोई साधन नहीं मिला।
5
शुक्र-सद-शुक्र कि मैं ज़िल्लत-ओ-ख़्वारी के सबब किसी उन्वान में हम-चश्म-ए-अज़ीज़ाँ न हुआ
शुक्र की चमक के कारण, मैं अपमान और नीचता के कारण, किसी उपाधि में हम-चश्म-ए-अज़ीज़ाँ नहीं हो पाया।
6
बर्क़ मत ख़ोशे की और अपनी बयाँ कर सोहबत शुक्र कर ये कि मिरा वाँ दिल-ए-सोज़ाँ न हुआ
दूसरों की खुशी के बारे में बात मत करो, बल्कि अपनी संगत व्यक्त करो; शुक्र कर कि मेरा जलता हुआ दिल नहीं हुआ।
7
दिल-ए-बे-रहम गया शैख़ लिए ज़ेर-ए-ज़मीं मर गया पर ये कुहन गब्र-मुसलमाँ न हुआ
निर्दयी दिल ने शेख को ज़मीन में लेटा दिया। मर गया, पर यह पुरानी कब्र, ऐ मुसलमाँ, आरामगाह नहीं बनी।
8
कौन सी रात ज़माने में गई जिस में 'मीर' सीना-ए-चाक से मैं दस्त-ओ-गरेबाँ न हुआ
कौन सी रात ज़माने में गई, जिसमें 'मीर' सीना-ए-चाक से दस्त-ओ-गरेबाँ नहीं हुआ।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.