कसरत-ए-दाग़ से दिल रश्क-ए-गुलिस्ताँ न हुआ — मीर तक़ी मीर
कसरत-ए-दाग़ से दिल रश्क-ए-गुलिस्ताँ न हुआ
मेरा दिल ख़्वाह जो कुछ था वो कभू याँ न हुआ
“From the exertion of the stain, the heart did not become the envy of the garden; / Whatever my heart desired, it never came to pass.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
दाग़ की अधिक मेहनत से दिल बाग़ का नक़ल नहीं बना; / मेरा दिल जो भी चाहता था, वह कभी नहीं हुआ।
विस्तार
यह शेर अनकहे ख्वाहिशों और तजुर्बों का सार है। शायर कहते हैं कि दिल पर कितनी भी चोटें लगें, फिर भी वह किसी बगीचे की तरह जलन नहीं करता। यह एक गहरा दर्द है, एक स्वीकारोक्ति... कि जो भी ख्वाहिशें हमने दिल में संजोई थीं, वो कभी पूरी नहीं हो पाईं। यह विरह और तसल्ली का एक संगम है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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