कौन सी रात ज़माने में गई जिस में 'मीर' — मीर तक़ी मीर

कौन सी रात ज़माने में गई जिस में 'मीर' सीना-ए-चाक से मैं दस्त-ओ-गरेबाँ न हुआ

“What night, in the world, has passed, in which I, 'Mir', Could not become detached from the chest of the beloved?”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

कौन सी रात ज़माने में गई, जिसमें 'मीर' सीना-ए-चाक से दस्त-ओ-गरेबाँ नहीं हुआ।

विस्तार

मीर तक़ी मीर इस शेर में वक़्त और वजूद के रिश्ते पर सवाल उठाते हैं। 'सीना-ए-चाक' का मतलब है दिल की गहराई या अपना असली अहसास। शायर कह रहे हैं कि ज़माना चाहे कितना भी बदल जाए, मैं अपने दिल के नज़दीक, अपने असली वजूद से कभी पराया नहीं हुआ। यह आत्म-पहचान और भावनात्मक ईमानदारी का एक गहरा तसव्वुर है।

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