ग़ज़ल
पैग़ाम-ए-ग़म जिगर का गुलज़ार तक न पहुँचा
पैग़ाम-ए-ग़म जिगर का गुलज़ार तक न पहुँचा
यह ग़ज़ल एक गहरे भावनात्मक दर्द और निराशा को व्यक्त करती है, जिसमें वक्ता का संदेश (पैग़ाम-ए-ग़म) उसके हृदय (जिगर) से गुलज़ार तक नहीं पहुँच पाता। यह दर्शाती है कि शिकायत और पीड़ा का भाव, चाहे वह कहीं भी व्यक्त किया जाए, अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच पाता।
गीत सुनें
1
पैग़ाम-ए-ग़म जिगर का गुलज़ार तक न पहुँचा
नाला मिरा चमन की दीवार तक न पहुँचा
शायर कह रहे हैं कि ग़म का संदेश न तो दिल के बगीचे तक पहुँचा और न ही मेरी नदियाँ आँगन की दीवार तक पहुँची।
2
उस आइने के मानिंद ज़ंगार जिस को खावे
काम अपना उस के ग़म में दीदार तक न पहुँचा
उस शीशे की तरह जंग जो खा जाता है, जिसके ग़म में अपना काम है, वहाँ तो दीदार तक पहुँचा नहीं जा सकता।
3
जूँ नक़्श-ए-पा है ग़ुर्बत हैरान-कार उस की
आवारा हो वतन से जो यार तक न पहुँचा
जुँ नक़्श-ए-पा है ग़ुर्बत हैरान-कार उस की, आवारा हो वतन से जो यार तक न पहुँचा। (अर्थ: विरह के निशान आश्चर्यजनक हैं; वह आवारा हो जो न तो वतन तक पहुंचा और न ही यार तक।)
4
लबरेज़-ए-शिकवा थे हम लेकिन हुज़ूर तेरे
कार-ए-शिकायत अपना गुफ़्तार तक न पहुँचा
हम तो बस शिकायतें फुसफुसाकर करते थे, लेकिन हे मेरे रब, आपने अपनी शिकायतें तो हमारे होंठों तक ही नहीं पहुँचने दी।
5
ले चश्म-ए-नम-रसीदा पानी चुवाने कोई
वक़्त-ए-अख़ीर उस के बीमार तक न पहुँचा
आँखों के नम दर्पण से पानी पीने कोई आया, पर वक़्त-ए-अख़ीर उस बीमार तक कभी पहुँचा नहीं।
6
ये बख़्त-ए-सब्ज़ देखो बाग़-ए-ज़माना में से
पज़मुर्दा गुल भी अपनी दस्तार तक न पहुँचा
ये हरी-भरी किस्मत देखो, ज़माने के बाग से, एक मुरझाया फूल भी अपनी पगड़ी तक नहीं पहुँच पाया।
7
मस्तूरी ख़ूब-रूई दोनों न जम' होवें
ख़ूबी का काम किस की इज़हार तक न पहुँचा
मस्तूरी और ख़ूब-रूई दोनों का एक साथ न जमना चाहिए, और किसी भी काम की ख़ूबी तब तक नहीं दिखाई जा सकती जब तक वह अपनी सीमा तक न पहुँच जाए।
8
यूसुफ़ से ले के ता-गुल फिर गुल से ले के ता-शम्मा
ये हुस्न किस को ले कर बाज़ार तक न पहुँचा
यूसुफ़ से ले के ता-गुल फिर गुल से ले के ता-शम्मा, यह हुस्न किस को ले कर बाज़ार तक न पहुँचा। इसका शाब्दिक अर्थ है कि जैसे यूसुफ़ से बगीचा लिया और फिर बगीचे से फूल लिया, वैसे ही यह सुंदरता किस को बाज़ार तक नहीं पहुँचा सकती।
9
अफ़्सोस 'मीर' वे जो होने शहीद आए
फिर काम उन का उस की तलवार तक न पहुँचा
अफ़सोस, मीर! जो लोग शहीद होने आए, उनके कर्म उनकी तलवार तक पहुँच नहीं पाए।
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