उस आइने के मानिंद ज़ंगार जिस को खावे — मीर तक़ी मीर

उस आइने के मानिंद ज़ंगार जिस को खावे काम अपना उस के ग़म में दीदार तक न पहुँचा

“Like that mirror, the tarnish which consumes, Whose sorrow in its sight, no glimpse is found.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

उस शीशे की तरह जंग जो खा जाता है, जिसके ग़म में अपना काम है, वहाँ तो दीदार तक पहुँचा नहीं जा सकता।

विस्तार

यह शेर ग़म की उस गहराई को बयां करता है जो हमें भीतर से खोखला कर देती है। यहाँ 'ज़ंगार' कोई धातु का जंग नहीं है, बल्कि वह गहरा दर्द है जो वक़्त और जुदाई से आता है। शायर कह रहे हैं कि उनका ग़म इतना ज़्यादा था... कि वह महबूब का दीदार... उसके दुःख में भी नहीं कर पाए। यह उस दर्द की बात है जो न सिर्फ़ आँखों से, बल्कि रूह से भी देख लेता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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