मस्तूरी ख़ूब-रूई दोनों न जम' होवें — मीर तक़ी मीर

मस्तूरी ख़ूब-रूई दोनों न जम' होवें ख़ूबी का काम किस की इज़हार तक न पहुँचा

“The fine cotton and the fine clothes cannot be combined, How can the beauty of work be revealed if it does not reach its limit?”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

मस्तूरी और ख़ूब-रूई दोनों का एक साथ न जमना चाहिए, और किसी भी काम की ख़ूबी तब तक नहीं दिखाई जा सकती जब तक वह अपनी सीमा तक न पहुँच जाए।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा ग़ालिब के अंदाज़ में, खूबसूरती की एक बहुत गहरी उलझन को बयां करता है। शायर कहते हैं कि चाहे वह प्राकृतिक आकर्षण हो, या कोई बनावटी खूबसूरती... दोनों एक-दूसरे में कभी पूरी तरह नहीं मिल पाते। वह पूछते हैं कि असल में, खूबसूरती का काम कभी किसी तक अपनी अभिव्यक्ति नहीं पहुंचा। यह एक एहसास है कि हमारी सबसे खूबसूरत भावनाएं भी अक्सर ज़ाहिर नहीं हो पातीं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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