ग़ज़ल
'आलम में कोई दिल का तलबगार न पाया
'आलम में कोई दिल का तलबगार न पाया
यह ग़ज़ल जीवन के भ्रम और रिश्तों की अस्थिरता पर एक गहरा चिंतन है। कवि कहते हैं कि इस संसार में कोई भी सच्चे दिल से किसी की चाहत या तलबगार नहीं मिला। वह यह भी व्यक्त करते हैं कि हक़ (सत्य) को खोजने का तरीका लोगों को नहीं आता, और यहाँ हर चीज़ और हर रिश्ता अस्थायी है।
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1
'आलम में कोई दिल का तलबगार न पाया
इस जिंस का याँ हम ने ख़रीदार न पाया
अर्थ यह है कि इस संसार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो दिल की चाहत करे, और न ही कोई ऐसा खरीदार मिला जो इस तरह की वस्तु को खरीदने को तैयार हो।
2
हक़ ढूँडने का आप को आता नहीं वर्ना
'आलम है सभी यार कहाँ यार न पाया
अर्थ यह है कि आपको सच्चाई (हक़) खोजना नहीं आता, क्योंकि सभी संसार में दोस्त होते हैं, लेकिन दोस्त कहाँ मिल सकता है।
3
ग़ैरों ही के हाथों में रहे दस्त-ए-निगारीं
कब हम ने तिरे हाथ से आज़ार न पाया
निगारी का यह हुनर (कला) मैंने पराये लोगों के हाथों में दे दिया, पर वह सुकून कब मिलेगा जो मुझे तुम्हारे हाथ से नहीं मिला?
4
जाती है नज़र ख़स पे गह-ए-चश्म परीदन
याँ हम ने पर-ए-काह भी बे-कार न पाया
नज़र खस पर गह-ए-चश्म परीदन जाती है, और हमने पर-ए-काह भी बे-कार न पाया।
5
तस्वीर के मानिंद लगे दर ही से गुज़री
मज्लिस में तिरी हम ने कभू बार न पाया
तस्वीर जैसी लगी दर से गुज़री, महफ़िल में तेरी हम ने कभी बार न पाया।
6
सूराख़ है सीने में हर इक शख़्स के तुझ से
किस दिल के तरह तीर-ए-निगह पार न पाया
हर व्यक्ति के सीने में आप के लिए एक घाव है; किस दिल के लिए आपकी नज़र का तीर पार न कर पाए।
7
मरबूत हैं तुझ से भी यही नाक्स-ओ-नाअहल
उस बाग़ में हम ने गुल-ए-बे-ख़ार न पाया
हमें तुमसे भी यह निश्चित है कि कोई दुःख या परेशानी नहीं है, लेकिन उस बगीचे में हमें बिना कांटे का कोई फूल नहीं मिला।
8
दम बा'द जुनूँ मुझ में न महसूस था या'नी
जामे में मिरे यारों ने इक तार न पाया
यानी, मेरे दोस्तों, क्या मुझमें जुनून का नशा नहीं था, या मेरे दोस्तों ने मेरे जाम में कोई धुन नहीं पाई?
9
आईना भी हैरत से मोहब्बत की हुए हम
पर सैर हो इस शख़्स का दीदार न पाया
आईना यह देखकर हैरान है कि हमने इतना प्यार किया है, लेकिन इस व्यक्ति का दीदार (चेहरा) कभी नहीं हुआ।
10
वो खींच के शमशीर सितम रह गया जो 'मीर'
ख़ूँ-रेज़ी का याँ कोई सज़ा-वार न पाया
वो खींच के शमशीर सितम रह गया जो 'मीर', ख़ूँ-रेज़ी का याँ कोई सज़ा-वार न पाया। इसका शाब्दिक अर्थ है कि जो व्यक्ति तलवार खींचकर अत्याचार करता है, 'मीर', खून-खराबे का कोई दंड देने वाला नहीं मिल पाता।
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