ग़ैरों ही के हाथों में रहे दस्त-ए-निगारीं
कब हम ने तिरे हाथ से आज़ार न पाया
“The art of loving, which I let fall into the hands of strangers, When will I find the solace that I could not find from your own hand?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
निगारी का यह हुनर (कला) मैंने पराये लोगों के हाथों में दे दिया, पर वह सुकून कब मिलेगा जो मुझे तुम्हारे हाथ से नहीं मिला?
विस्तार
यह शेर एक आशिक़ की गहरी तन्हाई और दर्द को बयां करता है। शायर कहते हैं कि मेरे लिए स्नेह का हाथ भी ग़ैरों के हाथों में आ गया है। वो यह सवाल कर रहे हैं कि कब उन्हें आपके हाथ से चोट नहीं मिल पाई! यह उस दर्द की बात है, जो सिर्फ़ महबूब ही दे सकता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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