ग़ज़ल

तेग़-ए-सितम से उस की मिरा सर जुदा हुआ

तेग़-ए-सितम से उस की मिरा सर जुदा हुआ

यह ग़ज़ल विरह की पीड़ा और प्रेम के दर्द को व्यक्त करती है। शायर कहते हैं कि सितम की तलवार से मेरा सिर अलग हो गया, लेकिन ईश्वर का शुक्र है कि प्रेम का हक मुझको मिला। यह ग़ज़ल दिल टूटने और जीवन के अनुभवों के गहरे दर्द को दर्शाती है।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
तेग़-ए-सितम से उस की मिरा सर जुदा हुआ शुक्र ख़ुदा कि हक़ मोहब्बत अदा हुआ
तेग़-ए-सितम से उस की मिरा सर जुदा हुआ, जिसका अर्थ है कि क्रूरता के कप से मेरा सिर अलग हो गया; और शुक्र ख़ुदा कि हक़ मोहब्बत अदा हुआ, जिसका अर्थ है कि ईश्वर का धन्यवाद कि प्रेम का अधिकार पूरा हुआ।
2
क़ासिद को दे के ख़त नहीं कुछ भेजना ज़रूर जाता है अब तो जी ही हमारा चला हुआ
कासिद को देकर ख़त नहीं कुछ भेजना ज़रूर। जाता है अब तो जी ही हमारा चला हुआ।
3
वो तो नहीं कि अश्क थमे ही न आँख से निकले है कोई लख़्त-ए-दिल अब सौ जला हुआ
ये नहीं कि आँसू आँखों से रुकेंगे ही नहीं, बल्कि यह कि दिल का कोई टुकड़ा अब जल चुका है।
4
हैरान रंग बाग़-ए-जहाँ था बहुत रुका तस्वीर की कली की तरह दिल न वा हुआ
हैरान रंगों से भरे बाग़-ए-जहाँ बहुत रुका, पर मेरा दिल तस्वीर की कली जैसा नहीं हुआ।
5
आलम की बे-फ़िज़ाई से तंग आ गए थे हम जागा से दिल गया जो हमारा बजा हुआ
हम दुनिया की कृत्रिमता से तंग आ गए थे, जब हमारा दिल जीवन के स्रोत से दूर हो गया।
6
दर पे हमारे जी के हुआ ग़ैर के लिए अंजाम-ए-कार मुद्दई' का मुद्दआ' हुआ
हमारे द्वार पर ही, मन ने पराई इच्छा महसूस की, और परिणाम की खोज ही दावेदार की मांग बन गई।
7
उस के गए पे दिल की ख़राबी न पोछिए जैसे कसो का कोई नगर हो लुटा हुआ
किसी के चले जाने पर दिल की खराबी को ठीक करने की कोशिश न करें; यह उस नगर की तरह है जिसे लूटा गया हो।
8
बद-तर है ज़ीस्त मर्ग से हिज्रान-ए-यार में बीमार दिल भला न हुआ तो भला हुआ
शायर कहते हैं कि प्रिय से बिछड़कर जीना मरने से भी ज़्यादा बुरा है; और यह बीमार दिल अगर बच भी जाए, तो भला ही मर जाना बेहतर है।
9
कहता था 'मीर' हाल तो जब तक तो था भला कुछ ज़ब्त करते करते तिरा हाल क्या हुआ
मीर कहते थे कि जब तक (हाल) अच्छा था, तब तक सब ठीक था; लेकिन उसे (हाल को) काबू करने की कोशिश करते-करते उसका हाल क्या हो गया।
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