ग़ज़ल
नाज़-ए-चमन वही है बुलबुल से गो ख़िज़ाँ है
नाज़-ए-चमन वही है बुलबुल से गो ख़िज़ाँ है
यह ग़ज़ल एक प्रेम और विरह की भावना को दर्शाती है, जहाँ शायर प्रकृति की सुंदरता और प्रेम की तुलना करता है। यह बताता है कि जैसे चमन का नज़ा (आकर्षण) बुलबुल में है, वैसे ही महबूब के मुखड़े में एक अनूठी कशिश है। यह प्रेम का नशा और उससे जुड़ी बेचैनी का वर्णन है।
गीत सुनें
1
नाज़-ए-चमन वही है बुलबुल से गो ख़िज़ाँ है
टहनी जो ज़र्द भी है सो शाख़-ए-ज़ाफ़राँ है
बाग का नज़ाकत वही है, चाहे वह बुलबुल से आए या पतझड़ से; जो टहनी पीली है, वह केसर की शाख़ है।
2
गर इस चमन में वो भी इक ही लब-ओ-दहाँ है
लेकिन सुख़न का तुझ से ग़ुंचे को मुँह कहाँ है
यदि इस बाग में उसका भी एक ही मुँह और ठिकाना है, तो तुम्हारे वचन की कृपा से फूल को रास्ता कहाँ है।
3
हंगाम-ए-जल्वा उस के मुश्किल है ठहरे रहना
चितवन है दिल की आफ़त-ए-चश्मक बला-ए-जाँ है
उस के जादू के माहौल में टिके रहना मुश्किल है; दिल की नज़रों का यह कष्ट, जानलेवा मुसीबत है।
4
पत्थर से तोड़ने के क़ाबिल है आरसी तू
पर क्या करें कि प्यारे मुँह तेरा दरमियाँ है
पत्थर से टूटने के लायक हो शीशा तू, पर क्या करें कि प्यारे, तेरा मुखड़ा बीच में है।
5
बाग़-ओ-बहार है वो मैं किश्त-ए-ज़ाफ़राँ हूँ
जो लुत्फ़ इक इधर है तो याँ भी इक समाँ है
मैं बहारों और खुशियों का बाग़ हूँ, मैं केसरिया रंग की धारा हूँ; जहाँ एक जगह आनंद है, वहाँ भी एक जैसा माहौल है।
6
हर-चंद ज़ब्त करिए छुपता है इश्क़ कोई
गुज़रे है दिल पे जो कुछ चेहरे ही से अयाँ है
हर-चंद को ज़ब्त करने की कोशिश मत करो, क्योंकि इश्क़ कोई छुपता है। जो कुछ भी दिल से गुज़रा है, वह केवल चेहरों का एक प्रदर्शन है।
7
इस फ़न में कोई बे-तह क्या हो मिरा मुआरिज़
अव्वल तो मैं सनद हूँ फिर ये मिरी ज़बाँ है
इस कला में कोई मेरा मुकाबला नहीं कर सकता; मेरा वंशावली प्रमाण है, और यह मेरी ज़ुबान है।
8
आलम में आब-ओ-गिल का ठहराव किस तरह हो
गर ख़ाक है अड़े है वर आब है रवाँ है
आलम में आब-ओ-गिल का ठहराव किस तरह हो, जब ख़ाक अड़ी है और पानी बह रहा है।
9
चर्चा रहेगा उस का ता-हश्र मय-कशाँ में
ख़ूँ-रेज़ी की हमारी रंगीन दास्ताँ है
उसका ता-हश्र और मय-कशाँ में चर्चा रहेगा; हमारी ख़ूँ-रेज़ी की दास्ताँ रंगीन है।
10
अज़-ख़वीश रफ़्ता उस बिन रहता है 'मीर' अक्सर
रहते हो बात किस से वो आप में कहाँ है
अज़-ख़वीश रफ़्ता उस बिन रहता है 'मीर' अक्सर, जिसका मन बार-बार उस व्यक्ति के लिए बेचैन रहता है जो जा चुका है, और वह व्यक्ति जिसे आप पाना चाहते हैं या जिससे आप बात करना चाहते हैं, वह आप में कहीं नहीं है।
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