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अज़-ख़वीश रफ़्ता उस बिन रहता है 'मीर' अक्सर
रहते हो बात किस से वो आप में कहाँ है

Often, the heart remains restless for the one who departed, O Meer; Whose company is sought, from whom is conversation sought, that person is nowhere found within you.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

अज़-ख़वीश रफ़्ता उस बिन रहता है 'मीर' अक्सर, जिसका मन बार-बार उस व्यक्ति के लिए बेचैन रहता है जो जा चुका है, और वह व्यक्ति जिसे आप पाना चाहते हैं या जिससे आप बात करना चाहते हैं, वह आप में कहीं नहीं है।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर की रूहानी गहराई को दर्शाता है। शायर कहते हैं कि चाहत तो उस महबूब के बिना भी बनी रहती है, यह तो एक हकीकत है। लेकिन दूसरा मिसरा एक गहरा सवाल उठाता है—आप किस से बात कर रहे हैं? जवाब है, कि वह बात आपके अंदर भी नहीं है। यह एक ऐसी बेचैनी है जो न खुद में है, न किसी और में.... बस एक सवाल बनकर रह गई है।

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