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ग़ज़ल

सीना है चाक-ए-जिगर पारा है दिल सब ख़ूँ है

सीना है चाक-ए-जिगर पारा है दिल सब ख़ूँ है

यह ग़ज़ल एक गहरे भावनात्मक और दर्द भरे प्रेम की अभिव्यक्ति है, जिसमें वियोग और विरह का भाव प्रमुख है। कवि अपने दिल को एक ऐसी जगह बताते हैं जहाँ जीवन का हर कण प्रेम के रक्त से भरा है। यह रचना प्रेमी की बेबसी, उसके टूटे हुए दिल की पीड़ा, और प्रेम की कठोर रस्मों पर तड़प को दर्शाती है।

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1
सीना है चाक-ए-जिगर पारा है दिल सब ख़ूँ है तिस पे ये जान-ब-लब आमदा भी महज़ूँ है
मेरा सीना जीवन के चक्र की तरह है, मेरा दिल शुद्ध सार है, और मेरी आत्मा पूरी तरह रक्त है; इस पर, यह जान-ब-लब, चाहे यह आए भी, महज़ एक साधारण चीज़ है।
2
उस से आँखों को मिला जी में रहे क्यूँकर ताब चश्म-ए-ए'जाज़-ए-मिज़ा सहर-ए-निगह-ए-अफ़्सूँ है
उस व्यक्ति से, जिसकी आँखों में देखकर मेरा मन मोहित हो जाए, मन में और क्या इच्छा या उत्साह बचा है? उसकी अद्भुत कृपा भरी दृष्टि, एक मनमोहक सुबह के समान है।
3
आह ये रस्म-ए-वफ़ा होवे बर-उफ्ताद कहीं इस सितम पर भी मिरा दिल उसी का ममनूँ है
अरे! कहीं यह वफ़ा की रस्म ही टूट जाए। इस सितम पर भी मेरा दिल उसी का ममनूँ है।
4
कभू इस दश्त से उठता है जो एक अब्र तनिक गर्द-ए-नमनाक परेशाँ शुदा-ए-मजनूँ है
कभी इस रेगिस्तान से उठता है जो एक पागल प्रेमी, चेहरे की धूल से परेशान है।
5
क्यूँके बे-बादा लब-ए-जू पे चमन में रहिए अक्स-ए-गुल आब में तकलीफ़-ए-मय-ए-गुल-गूँ है
क्योंके बे-बादा लब-ए-जू पर चमन में रहिए। अक्स-ए-गुल आब में तकलीफ़-ए-मय-ए-गुल-गूँ है।
6
पार भी हो कलेजे के तो फिर क्या बुलबुल मिस्रा-नाला जिगर-कावी है गो मौज़ूँ है
यदि कलेजे का पार नहीं होता, तो फिर बुलबुल क्या है? जीगर का नाला शायर है, गो मौजूँ है।
7
शहर कितना जो कोई उन में सरिश्क-ए-अफ़्शाँ हो रू-कश-ए-गिर्या-ए-ग़म हौसला-ए-हामूँ है
शहर कितना जो कोई उन में सरिश्क-ए-अफ़्शाँ हो, रू-कश-ए-गिर्या-ए-ग़म हौसला-ए-हामूँ है। (अर्थात, शहर की सुंदरता या महत्व तब तक अधूरा है, जब तक उसमें कोई निश्छल और पवित्र आत्मा न आ जाए। और तुम्हारे आँसुओं से सना यह चेहरा मेरे हौसले का आधार है।)
8
ख़ून हर यक रक़म शौक़ से टपके था वले वो समझा कि मिरे नामे का क्या मज़मूँ है
हर एक क़तरा खून शौक़ से टपका था, ऐ वली; वो न समझा कि मेरे नाम में क्या मज़ा है।
9
'मीर' की बात पे हर वक़्त ये झुँझलाया कर सड़ी है ख़ब्ती है वो शेफ़्ता है मजनूँ है
मीर के कहे पर हर समय इतना झगड़ना नहीं चाहिए; वह स्त्री सड़ी है, वह स्त्री ख़ब्ती है और वह स्त्री मजनूँ है।
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