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कभू इस दश्त से उठता है जो एक अब्र तनिक गर्द-ए-नमनाक परेशाँ शुदा-ए-मजनूँ है

Sometimes rises from this desert, one who is a mad lover, distressed by the dust of the face.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

कभी इस रेगिस्तान से उठता है जो एक पागल प्रेमी, चेहरे की धूल से परेशान है।

विस्तार

यह शेर यादों की उस अथाह गहराई को छूता है, जो कभी खत्म नहीं होती। शायर कहते हैं कि जीवन का रेगिस्तान कितना भी खाली क्यों न हो, कभी-कभी एक छोटा सा बादल उठकर आता है। और वह बादल क्या है? वह तो बस महबूब की यादों की धूल है, जो हर वक्त उस दीवाने के दिल को परेशान करती रहती है। यह दिखाता है कि प्यार की छाप कितनी गहरी होती है!

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