ग़ज़ल

कली कहते हैं उस का सा दहन है

कली कहते हैं उस का सा दहन है

यह ग़ज़ल जीवन के विभिन्न पहलुओं और आंतरिक अनुभवों पर विचार करती है। यह बताती है कि जो कली (कोमल अवस्था) दिखती है, उसके पीछे भी एक तरह का दहन (जलन/पीड़ा) छिपा है। इसमें दर्द, आँसू और पुराने घावों के माध्यम से जीवन की जटिल सच्चाइयों और आध्यात्मिक अनुभवों को दर्शाया गया है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
कली कहते हैं उस का सा दहन है सुना करिए कि ये भी इक सुख़न है
कली कहते हैं कि उस का सा दहन है। सुना करिए कि यह भी एक सुख़न है।
2
टपकते दर्द हैं आँसू की जागा इलाही चश्म या ज़ख़्म-ए-कुहन है
आँसू की जगह से टपकते दर्द हैं, या ये पुराने ज़ख्म हैं, हे इलाही?
3
ख़बर ले पीर-ए-कनआँ' की कि कुछ आज निपट आवारा बू-ए-पैरहन है
शायर, ख़बर ले पीर-ए-कनआँ' की कि कुछ आज निपट आवारा बू-ए-पैरहन है। इसका शाब्दिक अर्थ है: 'हे पीर-ए-कनआँ', यह खबर ले लो कि आज एक आवारा व्यक्ति के कपड़े की खुशबू आ रही है।
4
नहीं दामन में लाला बे-सुतूँ के कोई दिल-ए-दाग़ ख़ून-ए-कोहकन है
लाला बे-सुतूँ के दामन में कोई दिल-ए-दाग़, ख़ून-ए-कोहकन नहीं है।
5
शहादत-गाह है बाग़-ए-ज़माना कि हर गुल उस में इक ख़ूनीं-कफ़न है
दुनिया का बाग़ एक शहादत का मैदान है, जहाँ हर फूल एक ख़ूनी कफ़न में लिपटा है।
6
करूँ क्या हसरत-ए-गुल को वगर्ना दिल पर दाग़ भी अपना चमन है
शायर पूछ रहा है कि गुलाब की लालसा (हसरत) को लेकर उसे क्या करना चाहिए, क्योंकि उसका अपना दिल ही एक ऐसा बाग है जिस पर दाग़ लगे हुए हैं।
7
जो दे आराम टक आवारगी 'मीर' तो शाम-ए-ग़ुर्बत इक सुब्ह-ए-वतन है
जो आराम टका आवारगी देती है, 'मीर', वह तो ग़ुरबत की शाम नहीं, बल्कि वतन की सुबह है।
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