जो दे आराम टक आवारगी 'मीर' — मीर तक़ी मीर
जो दे आराम टक आवारगी 'मीर'
तो शाम-ए-ग़ुर्बत इक सुब्ह-ए-वतन है
“The ease that grants rest, the wandering days 'Mir, Are but an evening of exile, a morning of homeland.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
जो आराम टका आवारगी देती है, 'मीर', वह तो ग़ुरबत की शाम नहीं, बल्कि वतन की सुबह है।
विस्तार
यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर साहब ने ग़ुर्बत और वतन के रिश्ते को बहुत खूबसूरती से समझाया है। शायर कहते हैं कि अगर भटकने की ज़िंदगी, दूर रहने का आलम, हमें कोई सुकून देता है, तो यह शाम-ए-ग़ुर्बत असल में वतन की सुबह है। इसका मतलब है कि हमें अपनी मुश्किलों और दूरियों में ही अपना सच्चा ठिकाना मिल जाता है। यह एक बहुत ही गहरा अहसास है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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