ग़ज़ल
गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया
गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया
यह ग़ज़ल बताती है कि तीव्र गर्मी और इश्क़ की आग के कारण वक्ता लगभग पिघल गया है। वह अपनी नाज़ुक और अस्थिर भावनाओं को व्यक्त करता है, जैसे कि रात भर रोने से झूम जाना। वक्ता बताता है कि प्रेम की मस्ती में वह कहीं और भटक गया था, लेकिन अंततः खुद को संभाल पाया।
गीत सुनें
1
गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया
रातों को रोते रोते ही जों शम-ए-गुल गया
गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया, और रातों को रोते-रोते ही मैं शम-ए-गुल बन गया।
2
हम ख़स्ता-दिल हैं तुझ से भी नाज़ुक-मिज़ाज-तर
तेवरी चढ़ाई तू ने कि याँ जी निकल गया
हम तुझसे भी ज़्यादा नाज़ुक और ख़स्ता-दिल हैं, फिर भी तूने जो तड़पाया है, उससे हमारा जीवन लगभग निकल गया है।
3
गर्मी-ए-इश्क़ माने नश्व-ओ-नुमा हुई
मैं वो निहाल था कि उगा और जल गया
इश्क़ की गर्मी को मैंने शाम की चमक मान लिया; मैं इतना निहाल हुआ कि मैं खिला और जल गया।
4
मस्ती में छोड़ दैर को का'बे चला था मैं
लग़्ज़िश बड़ी हुई थी व-लेकिन सँभल गया
मस्ती में मैं काबा को छोड़कर चल दिया था; मेरा नशा बहुत बढ़ गया था, लेकिन मैं संभल गया।
5
साक़ी नशे में तुझ से लुंढा शीशा-ए-शराब
चल अब कि दुख़्त-ए-ताक का जोबन तो ढल गया
साक़ी, नशे में तुम मुझ से शराब का एक भटकता हुआ शीशा हो; अब चल, क्योंकि दुख के मेहराब का यौवन तो ढल गया है।
6
हर ज़र्रा ख़ाक तेरी गली की है बे-क़रार
याँ कौन सा सितम-ज़दा माटी में रुल गया
तुम्हारी गली का हर कण कीचड़ में बेचैन है, कौन सा क्रूर खेल है जिसने धरती को तड़पा दिया।
7
उर्यां तनी की शोख़ी से दीवानगी में 'मीर'
मजनूँ के दश्त-ए-ख़ार का दामाँ भी चल गया
आपके सौंदर्य की मस्ती से पागल होकर, 'मीर' कहते हैं कि मजनूँ के कांटेदार रेगिस्तान का किनारा भी हिल गया।
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