मस्ती में छोड़ दैर को का'बे चला था मैं — मीर तक़ी मीर

मस्ती में छोड़ दैर को का'बे चला था मैं लग़्ज़िश बड़ी हुई थी व-लेकिन सँभल गया

“In my revelry, I left the Kaaba behind, I was walking; the intoxication had grown great, but I regained my balance.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

मस्ती में मैं काबा को छोड़कर चल दिया था; मेरा नशा बहुत बढ़ गया था, लेकिन मैं संभल गया।

विस्तार

यह शेर जीवन के उस नाजुक मोड़ को दिखाता है, जहाँ हम मस्ती और बेपरवाही में होते हैं। शायर कहते हैं कि मैं अपनी हद से बाहर निकल गया, जैसे का'बे के आँगन से दूर चला गया। यह 'झिझक' या 'गिरना' हमारी मानसिक अस्थिरता को दर्शाता है। लेकिन सबसे खूबसूरत बात यह है कि अंत में, हम खुद को संभाल लेते हैं। यह शेर हमें सिखाता है कि ज़िंदगी में कितनी भी बड़ी चूक हो जाए, वक़्त पर खुद को संभाल लेना ही सबसे बड़ी जीत है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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